नई बोतल में पुरानी शराब

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने तीसरे टर्म में अपने जिन 72 सहयोगियों की टीम का चयन किया है उनमें 32 नए चेहरे व 40 वही चेहरे हैं जो पहले भी उनकी सरकार का हिस्सा रह चुके हैं। मोदी ने अपने इन मंत्रियों को विभागों के बंटवारे कर दिए हैं। पिछली सरकार में जो भी अहम मंत्रालय जिसके पास थे अधिकांश वही सब के सब मंत्रालय फिर उन्हें ही सौंप दिए हैं। अपवाद के रूप में दो—चार मंत्रालयों में थोड़ा बहुत फेरबदल किया है। गृहमंत्री इस बार भी अमित शाह ही रहेंगे और रक्षा मंत्रालय को भी राजनाथ सिंह ही देखेंगे। वित्त मंत्री के पद पर सीतारमण ही रहेगी तथा विदेश मंत्रालय एस जयशंकर के पास ही रहेगा। सिंधिया से नगर विमानन विभाग हटाकर उन्हें अब दूर संचार की जिम्मेदारी दी गई अपने मुख्यमंत्रियों शिवराज सिंह चौहान को कृषि एवं खाघ प्रसंस्करण तथा मनोहर लाल खटृर को दो अहम मंत्रालय दे दिए गए हैं। स्वास्थ्य तथा शिक्षा विभाग और रेल मंत्रालय की जिम्मेदारी अपने सहयोगियों को सौंप दी गई है। अब सवाल यह उठ रहा है कि जेडीयू और टीडीपी व एनसीपी (अजीत गुट) और शिवसेना (शिंदे) को क्या मिला? तो उसे आप इस तरह से समझ सकते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें झुनझुना ही थमा दिया है। स्थिति नीतीश कुमार देखते ही रह गए और रेल मंत्रालय अश्विनी वैष्णव ले गए। जेपी नड्डा को स्वास्थ्य विभाग जैसा अहम मंत्रालय मिल गया और तो और चिराग पासवान भी खाघ प्रस्करण और उघोग मंत्रालय पा गये लेकिन सात सांसद संख्या वाले शिवसेना शिंदे के हिस्से में क्या आया सिर्फ एक पद वह भी राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार वाला। एनसीपी (अजीत) जिनमें एक लोकसभा और एक राज्यसभा में दो सांसद हैं उसके नेता प्रफुल्ल पटेल ने उन्हें राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार दिया गया जिसे उन्होंने यह कहकर ठुकरा दिया कि वह जब कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं तो अब राज्य मंत्री पद लेकर वह अपनी अवनति नहीं करा सकते हैं। उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना की सफलता के कारण शिंदे की शिवसेना को नकार दिया जाना शिंदे गुट की नाराजगी का स्वभाविक कारण है। मंत्रियों को मंत्रालयों के बंटवारे के साथ जिस तरह के विरोध के स्वर फूट रहे हैं तथा जदयू से लेकर टीडीपी जो अपना स्पीकर मांग रही है जो उसे मिलता नहीं दिख रहा है शिंदे और अजीत पवार जो बेबस महसूस कर रहे हैं और मोदी अपने पुराने तेवर दिखाने पर आमादा हो चुके हैं ऐसे में उनकी सरकार आगे कैसे चलेगी यह समय ही बताएगा। 18 जून को स्पीकर का चुनाव होना है जिसका इंतजार टीडीपी कर रही है। रेल मंत्रालय नहीं मिला इसे लेकर नीतीश कसमसा रहे हैं। सिंधे और अजीत पवार के साथ तो खेला ही हो चुका है। ऐसे में अगर टीडीपी अपने स्पीकर पर अड़ गई और संख्या बल से चुनाव होने की नौबत आ गई तो इस मोदी सरकार की उम्र यहीं खत्म हो सकती है। मोदी सरकार को कुछ यानी 4—6 माह के ही समय का इंतजार है कि वह कैसे भी गुजर जाए इस बीच वह 240 से 272 तक पहुंचने का जुगाड़ कर ही लेगी सबके अपने अपने दांव पेच है। सबको कुछ न कुछ चाहिए और सभी को एक समय विशेष का इंतजार है। इस सरकार के गठन के साथ ही मोदी ने यह तो साफ कर ही दिया है कि वह किसी के भी दबाव में काम नहीं करेंगे अब देखना यह है कि क्या सहयोगियों का यह दबाव उस हद तक जाता है जब तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेई ने अपनी 13 दिन की सरकार का इस्तीफा यह कहते हुए दे दिया था कि वह किसी चिमटे का सहारा नहीं लेंगे। यानी कि मोदी सहयोगियों व इंडिया को तोड़कर 272 का आंकड़ा जुटा कर अगले 5 साल तक निष्कंटक शासन करते रहेंगे। यह भविष्य के गर्भ में ही छिपा है।

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