गरीबों का विकसित भारत

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केंद्र सरकार द्वारा मुफ्त राशन योजना को अब अगले 5 साल तक के लिए और बढ़ा दिया गया है। अभी बीते दिनों जब योजना की समयावधि समाप्त होने वाली थी तब सरकार ने इस योजना की अवधि को मार्च 2024 तक बढ़ाया गया था तब सरकार पर सवाल उठाया गया था कि इस मुफ्त राशन योजना का चुनावी लाभ उठाने के लिए ऐसा किया गया है। अब तेलंगाना में होने वाले मतदान से ठीक एक दिन पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल की कैबिनेट बैठक में इसे 5 साल और आगे तक जारी रखने का फैसला लिया गया है। इस योजना को सरकार द्वारा कोरोना काल में उन गरीब लोगों की मदद के लिए शुरू किया गया था जो काम—धाम ठप होने के कारण कठिनाई के दौर से गुजर रहे थे लेकिन कोरोना काल के समाप्त होने के बाद भी सरकार ने इस योजना को क्यों जारी रखा इसे लेकर तो सवाल उठना स्वाभाविक है। क्यों इस योजना की समयावधि को बार—बार बढ़ाने की जरूरत पड़ रही है यह एक बड़ा सवाल है। क्या इस योजना के कोई राजनीतिक निःतार्थ है या फिर यह योजना गरीबों की मदद के लिए अनिवार्य हो गई है जिसे यदि समाप्त किया गया तो करोड़ों लोगों का जीवन संकट में पड़ जाएगा और वह भूखे प्यासे मर जाएंगे। यह सच नहीं है सच यह है कि केंद्रीय सत्ता पर काबिज राजनीतिक दल और नेताओं द्वारा लोक कल्याण की इस योजना की आड़ में अपने राजनीतिक हित साधने के प्रयास किया जा रहे हैं। विकसित भारत का नारा बुलंद करने वाले इन नेताओं को इस बात की भी कोई चिंता नहीं है कि इससे पूरे विश्व में यह संदेश जा रहा है कि भारत के 81 करोड़ लोग इतने गरीब हैं कि उन्हें जिंदा रखने के लिए सरकार को मुफ्त राशन की व्यवस्था करनी पड़ रही है। इस मुफ्त राशन योजना का एक और पहलू यह है कि इसका लाभ लेने वाले 50 फीसदी से अधिक लोग वास्तव में इस योजना का लाभ लेने के हकदार तक नहीं है। वह मुफ्त के इस अनाज को खुद खाते तक नहीं है राशन की दुकानों से लेकर इकट्ठा करके अधिक कीमत पर बाजार में बेच देते हैं। अगर सरकार वास्तव में इस योजना को गरीब कल्याण के लिए चला रही है तो उन गरीबों को चिन्हित करने की जरूरत है जो वास्तव में गरीब हैं तथा उन्हें पांच नहीं दस किलो राशन प्रतिमाह दे तो ज्यादा बेहतर होगा। लेकिन सरकार ऐसा भी करने को तैयार नहीं है क्योंकि फिर नेता सीना ठोक कर यह नहीं कह पाएंगे कि वह 81 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन दे रहे हैं। क्योंकि काम और उसकी गुणवत्ता से ज्यादा उनके लिए वह प्रचार है जो चुनाव में अधिक वोट दिला सकता है। सरकार शायद इस योजना को बंद भी इसलिए नहीं कर रही है क्योंकि उसे डर है की मुफ्त का अनाज पाने वाली जनता जनार्दन कहीं इन मुफ्त की रेवड़ियों के बांटे जाने से बंद किए जाने पर नाराज न हो जाए। और सरकार को कौन सा अपने घर से कुछ देना है 12—13 लाख करोड़ अगर खर्च होता भी है तो क्या हुआ, है तो सब जनता का ही माल। इस देश के लोगों की भी बड़ी विडंबना यह है कि अगर उन्हें आप कोई राहत फौरी तौर पर दे दें तो वह आजीवन उसे अपना अधिकार मान लेते हैं। सरकारी नौकरियों के आरक्षण को ही देख लीजिए उसे कभी खत्म किया जाना तो दूर आज सभी आरक्षण देने या उनका कोटा बढ़ाने को लेकर जंग लड़ रहे हैं। यह मुफ्त की सुविधायें या रेवड़ियां जब तक बांटी जाती रहेगी या जब तक मिलती रहेगी तब तक इस देश के गरीब, गरीब ही बने रहेंगे। यह वास्तव में गरीबों को गरीब बनाए रखने का एक राजनीतिक षड्यंत्र है ऐसे में भारत विकसित देश भला कैसे बन सकता है समझ से परे है।

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