यह कैसी भाषा और संस्कृति ?

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यह कैसी धर्मनिरपेक्षता है? यह कैसा सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास है। कैसी बोली और भाषा है तथा कौन सी संस्कृति और सभ्यता है यह कौन सा और कैसा भाईचारा है तथा देश की अनेकता में एकता का कौन सा राग है। जिस पर हम देशवासी गर्व करते हैं? यह तमाम सारे सवाल आज देश की जनता के मन को मथ रहे हैं और इसके लिए हमारे वह जन प्रतिनिधि तथा माननीय जिम्मेदार हैं जो देश की संसद से लेकर विधान भवनो तक अपनी आपत्तिजनक बयान बाजी से पैदा कर रहे हैं। अमरोहा से बसपा सांसद दानिश अली के बारे में संसद में भाजपा सांसद रमेश बिधूड़ी ने जिस तरह की टिप्पणी की है वह न सिर्फ आपत्तिजनक है अपितु अत्यंत ही निंदनीय है आप भला धर्म के आधार पर किसी भी व्यक्ति को आतंकवादी या उग्रवादी कैसे कह सकते हैं। इस अत्यंत ही आपत्तिजनक बयान को लेकर लोकसभा अध्यक्ष को खत लिखकर कार्यवाही की मांग की गई है वहीं भाजपा अध्यक्ष ने भी उन्हें कारण बताओं नोटिस जारी किया है। दानिश ने यह चेतावनी भी दी है कि अगर विधूड़ी पर कार्रवाई नहीं की गई तो वह सदन की सदस्यता से इस्तीफा भी दे सकते हैं क्योंकि जनता ने उन्हें यहां नफरती भाषण सुनने के लिए नहीं भेजा है। यहां यह उल्लेखनीय है कि अभी बीते दिनों तमिलनाडु के एक मंत्री स्टालिन ने सनातन धर्म को लेकर जो आपत्तिजनक टिप्पणी की थी और सनातन की तुलना कोरोना, मलेरिया और डेंगू बुखार से की थी उसके लिए न्यायालय ने उन्हें नोटिस तो दिया ही है इसके साथ ही इस मुद्दे को भाजपा ने हाथों—हाथ लेते हुए इंडिया गठबंधन पर भी सौ सवाल खड़े कर दिए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनके बयान को तमाम जनसभा में यह कहकर प्रचार कर रहे हैं कि इंडिया सनातन को समाप्त करना चाहता है। सवाल यह है कि जो काम स्टालिन ने किया था और जो काम संसद में विधूड़ी ने किया है उसमें क्या फर्क है सवाल किसी दल विशेष के नेता या नेताओं का नहीं है सवाल उन सभी माननीय सदस्यों का है जो इस तरह की भद्दी भाषा श्ौली और नफरती बयान दे रहे हैं या जो सदन में इन बयानों पर चुटकियंा ले रहे हैं सब उसी व्यवस्था का हिस्सा है अगर कोई यह सोचे बैठा है कि इन तमाम बातों का उसे पर कोई प्रभाव पड़ने वाला नहीं है तो यह उसकी गलतफहमी ही है अच्छा हो कि जिम्मेदार और विधायी संस्थाएं इस तरह की घिनौनी और नफरती बयान बाजी को रोकने के लिए कठोर कदम उठाए अन्यथा आने वाले समय में यह समस्या एक कितना बड़ा नासूर बन जाएगी जिसका कोई उपचार भी संभव नहीं होगा देश के संविधान की जो मूल भावना धर्मनिरपेक्षता पर आधारित है उसको छिन्न—भिन्न करने के जो प्रयास इस दौर में किया जा रहे हैं वह किसी भी सूरत में देश और समाज हित में नहीं है। अभी जब नए सदन भवन में सांसदों को संविधान की जो प्रतियंा उपलब्ध कराई गई उसकी प्रस्तावना में उल्लिखित धर्मनिरपेक्ष शब्द को गायब करने की बात सामने आई थी तब क्या यह मान लिया जाना चाहिए कि अब संविधान में धर्मनिरपेक्षता का कोई मतलब नहीं रह गया है या फिर भाजपा का वह नारा जिसमें सबके विकास और सबके विश्वास की बात कही जाती है वह महज जनता को भ्रमित करने वाला एक नारा भर ही है। देश के सांसद और विधायक जाति धर्म को लेकर जिस तरह का विष वमन कर रहे हैं वह देश की वर्तमान और भावी पीढ़ी को क्या सिखाएगा और कहां ले जाएगा यह सभी दलों व नेताओं के लिए विचारणीय मुद्दा है।

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