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‘तिरंगे में लिपटा एक युग’

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  • नम आंखों के बीच पंचतत्व में विलीन हुए जनरल बीसी खंडूड़ी

देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति और भारतीय सेना का एक अनुशासित, सादगीपूर्ण और ईमानदार चेहरा आज पंचतत्व में विलीन हो गया। मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी की अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब केवल एक राजनेता को विदाई देने नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्तित्व को अंतिम प्रणाम करने पहुंचा था, जिसने जीवनभर अनुशासन, सादगी और जनसेवा को अपनी पहचान बनाए रखा।
तिरंगे में लिपटा पार्थिव शरीर जब अंतिम यात्रा के लिए निकला तो माहौल गमगीन हो उठा। हर आंख नम थी, हर चेहरा शांत और हर मन में एक ही भावकृएक ईमानदार दौर अब स्मृति बन गया। सेना के जवानों की सलामी, गूंजते राष्ट्रगान और खंडूड़ी अमर रहें के नारों के बीच जैसे पूरा उत्तराखंड अपने उस जनरल को विदा कर रहा था, जिसने सत्ता में रहकर भी सादगी नहीं छोड़ी। अंतिम यात्रा में बुजुर्गों की आंखों में सम्मान था तो युवाओं के चेहरों पर एक अलग तरह की उदासी। पहाड़ के गांवों से आए कई लोग सिर्फ एक झलक पाने के लिए घंटों खड़े रहे। उनके लिए खंडूड़ी केवल मुख्यमंत्री नहीं थे, बल्कि राजनीति में भरोसे और साफ छवि का प्रतीक थे।
उत्तराखंड की राजनीति में अक्सर यह कहा जाता रहा कि खंडूड़ी हैं जरूरी। यह केवल चुनावी नारा नहीं था, बल्कि उस जनविश्वास की अभिव्यक्ति थी जो उन्होंने अपने व्यवहार और निर्णयों से अर्जित किया। राजनीति के शोर और आरोपों के बीच भी उनकी छवि एक सख्त लेकिन ईमानदार प्रशासक की बनी रही। सेना से राजनीति तक का उनका सफर भी असाधारण रहा। फौजी अनुशासन उनके व्यक्तित्व में अंतिम समय तक दिखाई देता रहा। शायद यही कारण था कि उनकी अंतिम यात्रा में केवल राजनीतिक कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि आम लोग, पूर्व सैनिक, युवा और कर्मचारी वर्ग भी बड़ी संख्या में मौजूद रहा।
हरिद्वार में गंगा की लहरों की कलकल के बीच जब उनके पार्थिव शरीर को मुखाग्नि दी गई, तो मानो पहाड़ का एक रक्षक हमेशा के लिए सो गया। अंतिम यात्रा देहरादून से शुरू होकर जैसे-जैसे आगे बढ़ी, सड़क के दोनों ओर हजारों की संख्या में लोग हाथ जोड़े, आंखों में आंसू लिए खड़े थे। पवित्र गंगा घाट पर जब सेना के बिगुल ने अंतिम शोक धुन बजाई, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें छलक उठीं। मातमी धुन के बीच सेना के जवानों ने हवा में गोलियां दागकर अपने पूर्व जनरल को अंतिम सलामी दी।
जब चिता की लपटें उठीं तो कई आंखें भर आईं। ऐसा लगा जैसे उत्तराखंड की राजनीति का एक सादा, शांत और विश्वसनीय अध्याय धीरे-धीरे धुएं में बदलकर इतिहास का हिस्सा बन रहा हो। समय आगे बढ़ जाएगा, नई सरकारें आएंगी, नए चेहरे भी उभरेंगे, लेकिन पहाड़ की राजनीति में ईमानदारी, सादगी और अनुशासन की चर्चा जब भी होगी, जनरल खंडूड़ी का नाम उसी सम्मान के साथ लिया जाएगा जैसे आज उनकी अंतिम यात्रा में हर जुबान पर था। गंगा मां की गोद में विलीन हुए इस पहाड़ के गौरव को पूरा देश और उत्तराखंड हमेशा कृतज्ञ भाव से याद रखेगा।
अंतिम सलाम, मेजर जनरल! आपकी कमी हमेशा खलेगी।

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