हड़ताल पर रोक का प्रयोजन

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चुनावी साल में उत्तराखंड की सरकार द्वारा सरकारी कर्मचारियों की हड़ताल पर 6 माह के लिए रोक लगा दी गई है। सरकार द्वारा हड़ताल पर रोक के फैसले के पीछे चार धाम यात्रा को सुनियोजित ढंग से संचालित करना और मानसूनी आपदाओं से प्रभावी ढंग से निपटने का कारण बताया जा रहा है। लेकिन विपक्ष और कर्मचारी सरकार के इन तर्कों से सहमत नहीं हैं। सत्ता पक्ष का यह भी आरोप है कि विपक्ष कांग्रेस द्वारा सरकारी कर्मचारियों को भड़काया जा रहा है। वही कांग्रेस का कहना है की कई विभागों के कर्मचारी अपनी मांगों और पुरानी पेंशन बहाली की मांग को लेकर सड़कों पर धरने प्रदर्शन कर रहे थे अब सरकार सत्ता की हनक में दमनकारी रवैया अपना रही है सरकार कर्मचारियों की मांगों पर विचार करने या उनकी समस्याओं का समाधान करने की बजाए हड़ताल और प्रदर्शनों पर रोक लगाकर उन्हें चुपचाप बैठने पर विवश कर रही है। सरकार के इस फैसले पर कर्मचारियों की नाराजगी भी स्वाभाविक है क्योंकि इन कर्मचारियों को भी यह उम्मीद होती है कि सरकार भले ही पूरे 5 साल तक उनकी किसी भी मांग पर गौर करने या सुनने को तैयार न हो लेकिन चुनावी दौर में उनकी मांगों पर गौर करना सरकार की मजबूरी हो जाता है। इन दिनों जिन सरकारी विभागों और कर्मचारी यूनियनों द्वारा हड़ताल की जा रही थी उनके द्वारा सरकार को साफ चेतावनी दी जा रही थी कि अगर सरकार उनकी मांगों पर गौर नहीं करेगी या उनकी बात को नहीं माना जाएगा तो वह वोट की चोट से सरकार को अपनी ताकत का एहसास कराएगें। इसमें कहीं कोई संदेह नहीं है कि सरकार भी जानती है कि कर्मचारियों की नाराजगी का उसे चुनाव में क्या नुकसान हो सकता है आमतौर पर अब तक यही होता है कि जब चुनाव आने वाले होते हैं तो सरकारी कर्मचारी और कर्मचारी यूनियनों द्वारा अपनी बात मनवाने के लिए आंदोलन शुरू कर दिए जाते हैं और चुनाव आने तक इन्हें तेज और तेज किया जाता है तथा सरकारों द्वारा भी पहले इन कर्मचारियों की हड़ताल व धरने प्रदर्शनों को अनदेखा करने और फिर इन्हें बल प्रयोग के माध्यम से समाप्त कराने का प्रयास किया जाता है और अंत में अगर बात नहीं बनती दिखती है तो फिर उनकी मांगों को मानकर कर्मचारियों को खुश करने की कोशिशें की जाती है। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि हड़ताल पर रोक जैसे फैसले जो किसी भी सरकार द्वारा लिए जाते हैं वह राजनीति से प्रेरित ही होते हैं। इन फैसलों के पीछे सरकार द्वारा भले ही जनहित से जुड़ी कुछ वजह बताई जाए लेकिन यह पूरा सच नहीं है। सच यह भी है कि सरकार इस तरह के फैसले कर्मचारियों के आंदोलनों को दबाने या कमजोर करने के लिए ही देती है या अपनी जवाबदेही से बचने और मुख्य मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने के लिए इस तरह के फैसले लिए जाते हैं। सरकार ने कर्मचारियों की हड़ताल पर जो छह माह की रोक लगाई है इस दौरान अब धरने प्रदर्शन भी नहीं कर सकेंगे क्योंकि इसके लिए उनके पास समय ही नहीं होगा। सरकारी कर्मचारियों की हड़ताल पर रोक और उन पर अस्मा लगाने जैसे काम कोई नहीं बात नहीं है। हमने देखा है कि जब कर्मचारी सरकार की बात मानने को तैयार नहीं होते हैं तो वह उनका वेतन काटने और अस्मा लगाने की कार्रवाई करती है लेकिन जब आंदोलन समाप्त होते हैं और कर्मचारियों की मांगे मान ली जाती हैं तब उनके खिलाफ अस्मा के तहत दर्ज मामले भी वापस ले लिए जाते हैं तथा उनका वेतन काटने का फैसला भी वापस ले लिया जाता है। कहने का आशय है कि यह तमाम काम चाहे हड़ताल पर रोक लगाने के फैसला हो या फिर उन पर लगाए जाने वाला अस्मा और वेतन काटने का फैसला सभी का उद्देश्य कर्मचारियों को डराने धमकाने के लिए ही किया जाता है। जबकि सही मायने में इन सब का प्रयोग जनहित कार्यों के लिए किया जाना चाहिए।

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