लम्हाें ने खता की थी सदियों को…

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उन्माद और जिहाद में कोई खास फर्क नहीं है। किसी भी समाज और राष्ट्र के लिए यह हितकर नहीं हो सकते, इसमें किसी को भी संशय नहीं होना चाहिए। संविधान में धर्मनिरपेक्षता और सर्व धर्म समभाव तथा सहिष्णुता जैसे जिन गंभीर शब्दों का उल्लेख किया गया उनके अनुसरण से ही भारत की संस्कृति अनेकता में एकता की संस्कृति बन सकी है। हम जिस गंगा—जमुनी सभ्यता पर इतराते हैं और जिस भाईचारे की संस्कृति के लिए विश्व में अपनी एक अलग पहचान रखते हैं वह हमारी सबसे बड़ी पूंजी है। इस देश को अगर शांति का अग्रदूत माना जाता है तो उसके पीछे भगवान बौद्ध जिन्होंने मानव समाज को ट्टअहिंसा परमो धर्म’ का संदेश सिखाया और महात्मा गांधी जैसे महापुरुष जिन्होंने दुनिया को सत्य—अहिंसा का मार्ग बताया, की बड़ी भूमिका है। अपनी संस्कृति को जो हमारी धरोहर है हमारी पहचान है को अगर अक्षुण बनाए रखना है तो उन्माद और जेहाद जैसी स्थिति से बचकर रहने की जरूरत है। धर्म के बारे में आज के दौर में जो बताया और समझाया जा रहा है उससे मानवता और मानवीयता जैसे शब्दों को हटा दिया गया है जबकि हर धर्म का मूल मानवीयता का संवाहक है। धार्मिक और जातीय उन्माद पर सवार समाज सिर्फ फसाद और जेहाद के दलदल में फंसता जाता है। उन्माद और जिहाद से चुनावी जंग जीती जा सकती है किसी का दिल नहीं जीता जा सकता। धार्मिक सद्भाव को बनाए रखने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है सहिष्णुता। जब तक सभी जाति, धर्म और संप्रदाय के लोग एक दूसरे के प्रति सहिष्णु नहीं होंगे तथा एक दूसरे के धर्मों को सम्मान नहीं देंगे तब तक तकरार और सामाजिक टकराव की स्थिति को टाला नहीं जा सकता है। आज जब पूरे देश में धार्मिक और जातीय मुद्दों को लेकर जगह—जगह टकराव की स्थितियां पैदा हो रही है तो यह आश्चर्यजनक नहीं है। देश की आजादी से लेकर अब तक देश में सभी राजनीतिक दलों द्वारा की गई वह राजनीति ही है जिसने समाज को धर्म और जाति आधार पर हिस्सों में बांटने का काम किया है, जिसके परिणाम अब सामने हैं। नेताओं और राजनीतिक दलों द्वारा सभी मंडल और कमंडल को अपनी राजनीति का आधार बनाया तो दलित—मुस्लिम, ब्राह्मण व बनिया, नेता और वोटरों के तौर पर सामाजिक विभाजन की सीमा रेखाएं खींची जाती रही हैं। मंदिर—मस्जिद और आरक्षण की राजनीति ने देश की एकता और अखंडता को किस तरह का कितना नुकसान पहुंचाया है आज इसका आकलन किया जाना भी आसान नहीं है। आज देश में सामाजिक विघटन की जो चुनौती पैदा हुई है वह एक दिन में पैदा हुई समस्या नहीं है न ही इसका एक दिन में निदान संभव है। जो लम्हों ने खता की है उसकी सजा सदियों को भोगनी पड़ेगी। अब सब अपनी—अपनी हिफाजत के लिए एक दूसरे के आमने—सामने खड़े हैं तो इसमें हैरानी कैसी?

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