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अविश्वास के घेरे में लोकतंत्र

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देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने वाले उन स्वतंत्रता सेनानियों जिन्होंने अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया तथा उन संविधान निर्माताओं ने जिन्होंने देश को सबसे सशक्त संविधान दिया जिस पर हम गर्व करते हैं कि यह विश्व का सबसे श्रेष्ठ और पुराना लोकतंत्र है। उन्होंने कभी शायद इस बात की कल्पना भी नहीं की होगी कि इस देश के जननायक ही अमृत काल की आड़ में एक दिन लोकतंत्र को अविश्वास के घेरे में लाकर खड़ा कर देंगे। बीते कल देश के 193 सांसदों का हस्ताक्षरित एक अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस लोकतंत्र की आत्मा कहे जाने वाली निर्वाचन आयोग जैसी संस्था के प्रमुख के खिलाफ संसद के दोनों सदनों में दिया जाना इस बात का सबूत है कि अब देश का लोकतंत्र वाकई खतरे में है। तथा देश में पहली बार 2024 के चुनाव में जो संविधान बदले जाने की बात चर्चाओं में आई थी वह निराधार नहीं थी। देश ने भले ही पूर्व समय में आपातकाल और तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन के कठोर फैसलों का समय देखा हो लेकिन निर्वाचन आयोग के खिलाफ अविश्वास जैसी स्थिति कभी नहीं देखी। अब तक सरकारों पर अविश्वास जैसी स्थितियां तो आती रही है लेकिन लोकसभा अध्यक्ष और मुख्य निर्वाचन आयोग के खिलाफ अविश्वास जैसी स्थितियां इससे पूर्व कभी नहीं देखी गई। यह अत्यंत ही दुर्भाग्यपूर्ण और चिंतनीय इसलिए है क्योंकि सत्ता द्वारा देश की उस सबसे बड़ी संवैधानिक संस्था को हैक कर लिया गया है जिसके ऊपर लोकतंत्र की आत्मा की सुरक्षा का दायित्व था। बिना निष्पक्ष चुनावी व्यवस्थाओं के कोई भी लोकतंत्र जिंदा नहीं रह सकता है। इस सत्य को सभी जानते हैं। वर्तमान सरकार द्वारा अपने प्रचंड बहुमत के दम पर संवैधानिक नियमों में परिवर्तन के जरिए जो कुछ किया गया और मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्तियों के नियमों में बदलाव तथा उन्हें सभी कानून और संवैधानिक व्यवस्थाओं से ऊपर बना दिए जाने तक काम किया है उसके परिणाम अब देश के लोकतंत्र की हत्या किए जाने के रूप में हमारे सामने है। देश में जब तक संवैधानिक व्यवस्थाएं अस्तित्व में थी तब तक यही कहा जाता था कि संविधान और कानून से ऊपर कोई नहीं है न कोई व्यक्ति न सरकार न संस्था। लेकिन निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्तियों का अधिकार सत्ता में बैठे लोग करेंगे और निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ पद पर रहने तथा जीवित रहने तक कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकेगी जैसे नियमं कानून का सीधा अर्थ लोकतंत्र का खात्मा और संविधान की आत्मा का हनन नहीं तो और क्या है देश में भले ही संविधान लागू हो और निर्वाचन आयोग द्वारा ही चुनाव कराये जा रहे हो लेकिन इन चुनाव की निष्पक्षता पर उठने वाले सवाल और उन सवालों का कोई जवाब देने वाला ही न हो तो फिर काहे का लोकतंत्र और कैसा संविधान? यह बात अब सभी को साफ समझ में आ चुकी है। देश में घोषित तानाशाही के इस माहौल में भले ही विपक्षी सांसदों द्वारा सरकार के खिलाफ या फिर लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया जाए सब कुछ बेनतीजा ही है। इस बात को सत्ता में बैठे लोग भी जानते हैं फिर भी विपक्षी सांसद अगर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाए हैं तो देखिए इसका क्या नतीजा सामने आता है?

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