ईंधन का संकट

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ईरान इजरायल युद्ध का तेल और गैस आपूर्ति पर कितना प्रभाव पड़ रहा है यह दीगर बात है लेकिन 25 से 30 दिन तक किसी भी संकट से इनकार करने वाली सरकार ने घरेलू और कमर्शियल उपयोग में आने वाले गैस सिलेंडरों की कीमतों में भारी इजाफा कर दिया गया है। पेट्रोलियम मंत्री का कहना है कि यह बढ़ोतरी इसलिए की गई है क्योंकि संभावित भविष्य में गैस की आपूर्ति कम होने से संकट बढ़ सकता है जिससे निपटने के लिए कीमतों में इजाफा किया गया है रसोई गैस सिलेंडर की कीमतें 60 रूपये और कमर्शियल सिलेंडरों की कीमतों में 112 रुपए की वृद्धि से आम आदमी की दिक्कतें कितनी बढ़ गई है इस बात से सरकार को कोई सरोकार नहीं है। कमर्शियल सिलेंडर और रसोई गैस सिलेंडर के दाम बढ़ गए यह एक अलग मामला है लेकिन बढ़ी हुई कीमतों पर भी अगर आम आदमी और होटल तथा रेस्टोरेंटों में अगर गैस उपलब्ध नहीं हो पा रही है तो इससे उनका रोजगार ही प्रभावित नहीं हो रहा है बल्कि इसके सहारे अपना जीवन यापन करने वाले उन मजदूरों का जीवन भी प्रभावित हो रहा है जो स्ट्रीट फूड वैन और दुकान तथा ढाबों के खाने पर निर्भर है। सरकार द्वारा तो गैस सिलेंडरों की कीमतों में इजाफा किया गया है साथ ही आपूर्ति की कमी के कारण रसोई गैस की सिलेंडर की बुकिंग तक 25 से 30 दिन तक नहीं की जा रही है उपभोक्ता ऑनलाइन बुकिंग के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं किंतु उनको तकनीकी कारणों का हवाला दिया जा रहा है। कोई कह रहा है 21 दिन बाद ही उपभोक्ता सिलेंडर बुक करा सकते हैं लेकिन कोई 25 दिन की समय सीमा बता रहा है लेकिन सच यह है कि जो लोग एक माह बाद भी ऑनलाइन सिलेंडर बुक करा रहे हैं उनके सिलेंडर भी बुक नहीं किये जा रहे हैं। अगर वाकई इस युद्ध के कारण एक सप्ताह में ही ऐसे हालात पैदा हो चुके हैं कि रसोई गैस की आपूर्ति और कामर्शियल सिलेंडरों का मिल पाना इतना मुश्किल हो रहा है तो भारत सरकार को लोगों को अपनी समस्या को खुलकर बताना चाहिए अभी जब युद्ध शुरू हुआ था तो सरकार द्वारा लोगों को यह आश्वासन दिया गया था कि चिंता की कोई बात नहीं है सरकार के पास 25 से 30 दिन का भंडार है तथा सरकार सभी वैकल्पिक स्थितियों पर नजर बनाए हुए हैं। सरकार की नजर की बात तो सरकार ही जान सकती है लेकिन सच यह है कि होटल रेस्टोरेंट और स्ट्रीट फूड पर निर्भर रहने वालों तथा व्यवसाययों की दिक्कतें सिर्फ एक सप्ताह के अंदर ही उस सीमा को लांघ चुकी है कि वह अपना व्यवसाय चलाने में तथा लोगों को रोजगार और भोजन उपलब्ध कराने में स्वयं को असमर्थ पा रहे हैं यही नहीं लोग अब पुराने वैकल्पिक संसाधनों का सहारा लेने की बात तक कर रहे हैं कि लगता है आने वाले समय में उन्हें उपलो व लकड़ी के उपयोग कर चूल्हा जलाकर लोगों की भूख मिटाने पर सोचना पड़ेगा। निश्चित तौर पर यह स्थिति अत्यंत ही चिंतनीय है। जिसे लेकर हमारी सरकार इस कदर निश्चिंत दिख रही है जैसे यह कोई समस्या ही नहीं है।

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