उत्तराखण्ड की मित्र पुलिस मात्र सर्विलांस के सहारे ही चल रही है। यह बात हम नहीं कह रहे हैं यह बात जगजाहिर हो चुकी है बड़े अपराध करने वाले लोग मित्र पुलिस की इसी चूक का फायदा उठाने में जुटे हुए है। इस मामले में अगर राजधानी देहरादून की की जाये तो यहंा बीते एक सप्ताह के भीतर तीन महिलाओं की हत्या कर दी गयी थी। जिसमें से दो हत्यारोपियों को मित्र पुलिस द्वारा सर्विलांस के सहारे दबोच कर सलाखो के पीछे भेज दिया गया है। लेकिन तीसरे हत्यारोपी की तलाश आज घटना के 16 दिन बीत जाने के बाद भी मित्र पुलिस नहीं कर पा सकी है। पुलिस का यह कहना है कि हत्यारोपी चचेरा भाई मोबाइल नहीं रखता है इसलिये उसकी लोकेशन तलाश कर पाना मुश्किल हो रहा है। सवाल यह है कि क्या मित्र पुलिस सही ढर्रे पर काम करती है उसके पास पहले की तरह मुखबिर तंत्र क्यों नहीं है? इस बात का खुलासा पहले के मुखबिर तंत्र के कुछ लोगों का नाम ना छापने की शर्त पर किया जाता है। उनका कहना कहना है कि कुछ वर्ष पूर्व जब पुलिस के एक मुखबिर द्वारा एक स्थान पर गौंवश की हत्या किये जाने की सूचना जब पुलिस यानि (एसओजी) का दी गयी थी तो पुलिस ने वहंा से गौमांस बरामद कर उस आरोपी से पैसे खा लेने के बाद मुखबिर की जानकारी आरोपी का दे दी गयी। जिसके बाद आज तक पुलिस के उस मुखबिर के परिवार का पता नहीं चल सका है। ऐसे में मित्र पुलिस को किसी भी बड़े अपराध की सूचना देने को कोई तैयार क्याेें होगा? अब ऐसे में सवाला उठना लाजमी है कि अगर अपराधी मोबाइल फोन नहीं रखता है तो क्या मित्र पुलिस उसे पकड़ने का दम नही रखती है? क्या पुलिस को अपने मुखबिर तंत्र को फिर से सक्रिय करने की जरूरत नहीं है।




