लोकतंत्र कोई तमाशा नहीं

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देश की संसद में इन दिनों शीतकालीन सत्र के दौरान वंदे मातरम और चुनाव प्रक्रिया में सुधार के मुद्दों पर हो रही चर्चा को सुनकर कोई भी व्यक्ति इस निष्कर्ष पर आसानी से पहुंच सकता है कि देश में अब लोकतंत्र का अंश मात्र भी शेष नहीं बचा है तथा देश के नेताओं ने लोकतंत्र को तमाशा बनाकर रख दिया है। सत्ता पक्ष द्वारा सभी संवैधानिक व्यवस्थाओं और नियम कानूनों को ध्वस्त कर दिया गया है तथा येन—केन प्रकारेण चुनाव जीतना ही उनका उद्देश्य बनकर रह गया है। संसद में चुनकर पहुंचने वाले जनप्रतिनिधियों से लेकर विधानसभाओं में बैठे कितने जनप्रतिनिधि ऐसे हैं जो अपनी राजनीति सामाजिक समझ की श्रेष्ठता के कारण बड़े—बड़े पदों पर बैठे हैं और उनका उद्देश्य देश और देशवासियों की सेवा और उत्थान ही है। क्या इनका चुनाव तय नीतियों और नियमों के आधार पर हो रहा है? इसका ज्वलंत उदाहरण है बिहार चुनाव के दौरान एक करोड़ से भी अधिक महिलाओं को 10—10 हजार की नगद रकम दिया जाना। क्या कोई भी व्यक्ति देश के प्रधानमंत्री से लेकर गृहमंत्री और राष्ट्रपति से लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त और मुख्य न्यायाधीश तक कोई इस सवाल का जवाब दे सकता है कि क्या यह सब कुछ जो भी हो रहा है किस विधान के तहत किया जा रहा है और क्यों किया जा रहा है। इससे बड़ी अंधेर नगरी और चौपट राजा की और क्या मिसाल हो सकती है। जिनकी योग्यता एक आम नागरिक के बराबर भी नहीं है जिन्हें न हिंदी बोलनी आती है न अंग्रेजी वह देश चला रहे हैं। इससे बड़ा और इस लोकतंत्र का तमाशा और क्या बनाया जा सकता है? भूखी नंगी देश की जनता को सिर्फ छोटे—छोटे प्रलोभनों और झूठे वायदों के सहारे सत्ता में बने और आपस में लड़ाते रहने की जो राजनीति देश में हो रही है वह भारत को महान और विकसित भारत कैसे बना सकती है। यह बात हर एक भारतवासी के लिए एक विचारणीय मुद्दा है। सत्ता में बैठे लोगों द्वारा किस तरह से जनता का धन लूटा जा सकता है और कैसे अपना बचाव किया जाता है बस इस सोच को सामने रखकर ही नियम कानून बनाए जा रहे हैं और अगर उन पर कोई सवाल उठाए तो उसे जेल में डालने का काम किया जा रहा है तो कब तक आप ऐसे लोकतंत्र का डंका पीटते रह सकते हैं। देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सरकार द्वारा बनाए गए चुनावी बांड को असंवैधानिक ठहरा दिया गया लेकिन उससे सरकार को क्या फर्क पड़ा? चंडीगढ़ नगर निगम चुनाव या पीठासीन अधिकारी की चोरी पकड़ी गई तो उसे क्या फर्क पड़ा? संसद में बैठे लोग अगर गालियां दे रहे हैं और एक दूसरे का कुर्ता घसीट रहे हैं तो उससे क्या फर्क पड़ने वाला है अगर सरकार ने निर्वाचन आयुक्त को न्यायालय की किसी भी कार्रवाई से बचाने के लिए कानून बना दिया तो उसे किसने रोक लिया है। है न गजब की बात, प्रधानमंत्री के खिलाफ कानून काम करेगा तथा बड़े से बड़े संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर की जा सकती है मगर चुनाव आयुक्त कुछ भी करते रहे उनके खिलाफ मुकदमा भी दर्ज नहीं किया जा सकता ऐसा कानून भला कैसे कानून हो सकता है। धन्य है इस देश की सरकार जिसने ज्ञानेश कुमार को ऐसा सुरक्षा कवच प्रदान कर दिया है। जिस पर सेवानिवृत्ति के बाद भी कोई कानून लागू होगा ही नहीं। क्या इसे लोकतंत्र कहा जा सकता है। यह लोकतंत्र नहीं लोकतंत्र का तमाशा है। इस तमाशे को रोकना किसी विपक्ष के बूते की बात भी नहीं रह गई है ऐसी स्थिति में सिर्फ देशवासी ही इसे रोकने का एकमात्र विकल्प बचा है।

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