उत्तराखंड की जनता इन दिनों कुछ मुद्दों को लेकर सरकार से नाराज है। पहला मुद्दा है राज्य की बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं जिन्हें लेकर चौखुटिया से शुरू हुआ जन आंदोलन पूरे राज्य में पैर पसार चुका है, लोग राजधानी दून की ओर कूच कर रहे हैं जहां वह सीएम और स्वास्थ्य मंत्री धन सिंह के आवास घेराव की बात कर रहे हैं। वहीं दूसरा मुद्दा है शराब की दुकानों का और इन शराब के ठेको के आसपास बढ़ते आपराधिक मामलों का जिन्हे लेकर लोग सड़कों पर उतरे हुए हैं। अभी ऋषिकेश के मुनि की रेती में अजय कंडारी नाम के युवक की खाराश्रोत शराब के ठेके के पास चाकू से गोदकर हत्या कर दी गई। भले ही पुलिस ने हत्या को अंजाम देने की आरोपी युवक की गिरफ्तारी कर ली गई हो लेकिन यह कोई पहली मर्तबा नहीं है जब इस खाराश्रोत ठेके को लेकर सवाल उठे हैं। इससे पूर्व भी यहां कई आपराधिक वारदातें सामने आ चुकी है जिसके कारण लोग ठेके को हटाने की मांग कर रहे हैं। इस बार भी प्रशासन ने पूर्व की तरह ठेका हटाने का भरोसा जनता को दिया है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि राज्य में शराब से होने वाली भारी भरकम कमाई के लालच में राज्य में शराब के ठेको की भरमार कर डाली है तथा इन्हें हटाने के लिए क्षेत्रवासी खास तौर से राज्य की महिलाएं आए दिन इनका विरोध करने के लिए सड़कों पर दिखाई देती हैं। उधर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अब तक न जाने कितनी बार राज्य को नशा मुक्त बनाने की बात कह चुके हैं, लेकिन पहाड़ में शराब और नशे की गंगा जिस तरह अविरल गति से जारी है उसका सच किसी से भी छिपा नहीं है। दून की शांत वादियों में रेव पार्टियों के आयोजन का काफी लंबा इतिहास है। अभी बीते दिनों राजपुर रोड पर भी पुलिस ने एक रेव पार्टी पर छापा मारा था। नशा और नशा तस्करों का नेटवर्क राज्य में कितना मजबूत है तथा कैसे इस धंधे पर नामचीन लोगों का संरक्षण प्राप्त है यह सभी जानते हैं। अब बात चौखुटिया से शुरू हुए स्वास्थ्य अभियान की करें तो 2 अक्टूबर की घटना से शुरू हुआ यह आंदोलन अभी तक जारी है। अब क्षेत्रीय लोग स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के इस मुद्दे पर पदयात्रा करते हुए देहरादून की ओर बढ़ रहे हैं। चौखटिया की तरह ही टिहरी में भी अब एक महिला की बच्चें को जन्म देते समय मौत हो जाने के बाद आंदोलन शुरू हो गया है। राज्य के कोने—कोने से इन स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए चलाये जा रहे आंदोलन को व्यापक समर्थन मिल रहा है। इस समर्थन के पीछे अहम कारण यह है कि राज्य के हर जिलों में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति कमोवेश एक जैसी ही है। डांडी—कांडी के सहारे भी लोग मरीज को ढोते हैं और अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाएं न होने के कारण दम तोड़ते लोग आखिर चुप भी रहे तो आखिर कब तक। अस्पतालों में डॉक्टर नहीं है और कहीं मूलभूत सुविधाएं नहीं है। भले ही स्वास्थ्य मंत्री का दावा यह हो कि राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं में भारी सुधार हुआ है लेकिन इन सुविधाओं का सच किसी से भी छिपा नहीं है। वैसे यह सिर्फ दो ही मुद्दे ऐसे नहीं है जिन्हें लेकर प्रदेश की जनता सड़कों पर है। राज्य की खराब सड़कों तथा आपदा राहत जैसे अन्य अनेक मुद्दों को लेकर राज्य के लोगों की सरकार से भारी नाराजगी है और वह सरकार को पानी पी पीकर कोस रहे हैं। सत्ता पर इन जनता के आंदोलनों का कितना प्रभाव पड़ता है यह आने वाला समय ही बताएगा।




