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चुनावी शंखनाद से पहले ‘अग्निपरीक्षा’

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  • भाजपा की विधायकों के रिपोर्ट कार्ड पर टिकी नजरें
  • रिपोर्ट कार्ड तय करेगा दिग्गजों का सियासी भविष्य
  • परफार्मेंस के आधार पर खिसकेगी माननीयों की जमीन

देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में चुनावी बिगुल भले ही आधिकारिक तौर पर न बजा हो, लेकिन भाजपा के भीतर विधायकों की अग्निपरीक्षा शुरू हो चुकी है। रिपोर्ट कार्ड की कसौटी पर कौन खरा उतरता है और किसकी राजनीतिक जमीन खिसकती है, यह आने वाले महीनों में साफ हो जाएगा।
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव को लेकर सत्तारूढ़ भाजपा ने चुनावी तैयारियों की घड़ी अभी से तेज कर दी है। पार्टी संगठन ने मिशन-2027 के तहत सभी 70 विधानसभा सीटों पर कोर कमेटियों का गठन कर दिया है और अब विधायकों के प्रदर्शन का आकलन शुरू हो गया है। पार्टी सूत्रों की मानें तो इस बार टिकट वितरण का आधार केवल वरिष्ठता या राजनीतिक प्रभाव नहीं, बल्कि जनता के बीच विधायक की स्वीकार्यता और उनके कार्यों का रिपोर्ट कार्ड होगा।
भाजपा नेतृत्व विधानसभा क्षेत्रों से लगातार फीडबैक जुटा रहा है। इसमें विधायकों की जनता के बीच सक्रियता, विकास कार्यों की गति, संगठन के साथ तालमेल, स्थानीय मुद्दों के समाधान और सरकार की योजनाओं को जमीन तक पहुंचाने की क्षमता जैसे कई बिंदुओं को शामिल किया गया है। पार्टी यह भी जानना चाहती है कि किन विधायकों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर नाराजगी है और किन सीटों पर नए चेहरे उतारने की आवश्यकता पड़ सकती है।
भाजपा के लिए 2027 का चुनाव केवल सत्ता में वापसी का चुनाव नहीं, बल्कि मिशन रिपीट की प्रतिष्ठा का सवाल भी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में पार्टी विकास, समान नागरिक संहिता और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई को जनता के बीच प्रमुख उपलब्धियों के रूप में पेश करना चाहती है। दूसरी ओर कांग्रेस बेरोजगारी, पलायन, पेपर लीक और विभिन्न जन मुद्दों को हथियार बनाकर भाजपा को घेरने की रणनीति बना रही है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि जिन विधायकों का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं पाया जाएगा, उनके टिकट पर संकट खड़ा हो सकता है। पार्टी पिछले कुछ चुनावों में सर्वे और रिपोर्ट कार्ड के आधार पर उम्मीदवार बदलने का प्रयोग कर चुकी है और उत्तराखंड में भी इसी फार्मूले को अपनाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा।
विधायकों के रिपोर्ट कार्ड की चर्चा के बाद कई जनप्रतिनिधियों की सक्रियता अचानक बढ़ गई है। कहीं जनसभाएं हो रही हैं तो कहीं विकास योजनाओं के शिलान्यास और लोकार्पण कार्यक्रमों की संख्या बढ़ गई है। क्षेत्रीय स्तर पर जनता की शिकायतों के निस्तारण के प्रयास भी तेज हुए हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले महीनों में भाजपा के भीतर टिकट को लेकर प्रतिस्पर्धा और तेज होगी।
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल भी भाजपा के इस आंतरिक मूल्यांकन पर नजर बनाए हुए हैं। उनका मानना है कि यदि भाजपा बड़ी संख्या में टिकट बदलती है तो इसका राजनीतिक असर कई सीटों पर देखने को मिल सकता है। वहीं भाजपा इसे संगठन की मजबूती और जीत की रणनीति का हिस्सा बता रही है।

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