राजनीति में विरोधी को नाम देना पुरानी परंपरा है। कभी कोई देशद्रोही कहलाता है, कभी अराजकतावादी, कभी टुकड़े-टुकड़े गैंग और कभी किसी नए विशेषण से संबोधित किया जाता है। लेकिन लोकतंत्र की विडंबना तब सामने आती है, जब सत्ता की ओर से दिया गया कोई तंज विरोधियों के लिए ही पहचान और प्रतिरोध का प्रतीक बन जाए। दिमागी नक्सल भी अब इसी बहस का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है। प्रधानमंत्री के तंज के बाद इस शब्द को राजनीतिक पहचान के रूप में इस्तेमाल किए जाने और बड़ी संख्या में लोगों के इससे जुड़ने के दावे ने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया है क्या राजनीतिक विरोधियों को दिए गए विशेषण अब उनके खिलाफ नहीं, बल्कि उनके पक्ष में काम करने लगे हैं? यह केवल किसी नए राजनीतिक समूह के गठन का मामला नहीं है। इसके पीछे भारतीय राजनीति की बदलती भाषा और सोशल मीडिया के दौर में बन रहे नए राजनीतिक व्यवहार को समझने की जरूरत है। सत्ता जब किसी विरोधी विचार को खारिज करने के लिए एक कठोर विशेषण इस्तेमाल करती है तो वह शायद तत्काल राजनीतिक हमला समझती है। लेकिन सोशल मीडिया की दुनिया में शब्दों की यात्रा सत्ता के नियंत्रण में नहीं रहती। वही शब्द मीम बनता है, अभियान बनता है और कभी-कभी राजनीतिक पहचान का हिस्सा भी बन जाता है। यही इस पूरे घटनाक्रम की सबसे दिलचस्प बात है। लोकतंत्र का मूल स्वभाव ही असहमति है। सरकार की नीतियों पर सवाल करना, बेरोजगारी पर आवाज उठाना, महंगाई पर बहस करना, शिक्षा और स्वास्थ्य की बदहाली पर सवाल पूछना या किसी कानून का विरोध करना नागरिक जीवन का हिस्सा है। इन सवालों के जवाब तर्क और तथ्यों से दिए जाने चाहिए। यदि हर आलोचक को किसी खतरनाक राजनीतिक खांचे में डाल दिया जाएगा तो लोकतांत्रिक संवाद की जगह आरोपों की राजनीति ले लेगी। फिर मुद्दा यह नहीं रहेगा कि सवाल सही है या गलत। मुद्दा यह बन जाएगा कि सवाल पूछने वाला किस खेमे में है। यही स्थिति लोकतंत्र के लिए सबसे अधिक चिंताजनक है। दिमागी नक्सल नाम से सामने आए राजनीतिक प्रयोग को केवल मजाक या सोशल मीडिया की सनसनी मानकर खारिज करना भी जल्दबाजी होगी। क्योंकि जनता किसी राजनीतिक पहचान से क्यों जुड़ती है, यह सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण है। अगर बड़ी संख्या में लोग सचमुच इससे जुड़ रहे हैं तो मुख्यधारा की पार्टियों को यह समझना होगा कि जनता के भीतर किसी तरह की राजनीतिक बेचौनी मौजूद है। लेकिन यहां एक दूसरी कसौटी भी है। किसी तंज को अपना नाम बना लेना आसान है, राजनीति करना कठिन। सोशल मीडिया पर समर्थन और चुनावी मैदान में समर्थन एक चीज नहीं है। चुनाव संगठन, उम्मीदवार, बूथ और स्थानीय मुद्दों के दम पर जीता जाता है। इसलिए इस नए प्रयोग की असली परीक्षा तभी होगी जब यह नाम से आगे बढ़कर नीति और कार्यक्रम की बात करेगा। आज भारतीय राजनीति को सबसे ज्यादा जरूरत भाषा में संयम और बहस में गंभीरता की है। राजनीतिक विरोधी दुश्मन नहीं होते। सत्ता बदलना लोकतंत्र की सामान्य प्रक्रिया है। आज जो सत्ता में है, कल विपक्ष में हो सकता है। इसलिए ऐसे विशेषणों की राजनीति अंततः किसी एक दल को नहीं, पूरी राजनीतिक संस्कृति को नुकसान पहुंचाती है। लोकतंत्र में किसी व्यक्ति को यह साबित करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि वह सवाल पूछने के कारण राष्ट्रविरोधी नहीं है। सवाल पूछना नागरिक अधिकार है और सत्ता से जवाब मांगना लोकतंत्र की आत्मा। दिमागी नक्सल जैसा शब्द अगर अब राजनीतिक पहचान बन रहा है तो इसे केवल विरोधियों की चाल कहकर खारिज करने के बजाय सत्ता और विपक्ष दोनों को इससे पैदा हुए संदेश को पढ़ना चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे खतरनाक चीज असहमति नहीं, असहमति से डर है। तंज से राजनीति चमक सकती है, लेकिन लोकतंत्र मजबूत नहीं होता। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब सत्ता अपने आलोचक की आवाज सुनती है और आलोचक सत्ता के सामने तथ्य के साथ खड़ा होता है। इसलिए जरूरत किसी नए विशेषण की नहीं, एक ऐसी राजनीतिक भाषा की है जिसमें सवाल का जवाब सवाल से नहीं, तर्क से दिया जाए। यही लोकतंत्र की असली परीक्षा है।




