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आजादी का अमृत नहीं, लोकतंत्र की परीक्षा

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15 अगस्त 1947 को देश ने सिर्फ अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति नहीं पाई थी, बल्कि एक ऐसे भारत का सपना देखा था जिसमें सत्ता जनता के प्रति जवाबदेह होगी, संविधान हर नागरिक को बराबरी देगा और लोकतंत्र कमजोर की आवाज को भी उतनी ही जगह देगा, जितनी ताकतवर की आवाज को। आज जब भारत अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, तब तिरंगे के नीचे खड़े होकर सबसे जरूरी सवाल यही है क्या हम उस सपने के करीब पहुंचे हैं? आजादी के 79 वर्षों में भारत ने लंबी यात्रा तय की है। गरीबी से जूझते देश से दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने तक, खाद्यान्न संकट से आत्मनिर्भरता तक, बैलगाड़ी के दौर से डिजिटल इंडिया तक और सीमित संसाधनों से अंतरिक्ष की ऊंचाइयों तक भारत ने असाधारण उपलब्धियां हासिल की हैं। लोकतंत्र ने भी अनेक उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन उसकी जड़ें मजबूत बनी रहीं। लेकिन उपलब्धियों के इस उत्सव के बीच उन सवालों को भी सुनना होगा जो अक्सर राष्ट्रवाद के शोर में दब जाते हैं। क्या हर युवा को रोजगार मिल रहा है? क्या हर बच्चे को समान शिक्षा मिल रही है? क्या गांव का अस्पताल शहर के अस्पताल का विकल्प बन पाया है? क्या पहाड़ का नागरिक अपने घर में रहकर सम्मानजनक जीवन जी सकता है? क्या किसान अपनी मेहनत की उचित कीमत पा रहा है? क्या आम आदमी महंगाई के दबाव से मुक्त है? और सबसे बड़ा सवाल क्या लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा पहले जैसा मजबूत है? आजादी का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं है। आजादी का अर्थ भय से मुक्ति भी है। भेदभाव से मुक्ति भी है। भूख और बेरोजगारी से मुक्ति भी है। अन्याय के सामने चुप रहने की मजबूरी से मुक्ति भी है। भारत का संविधान इसी व्यापक स्वतंत्रता का दस्तावेज है। संविधान हमें अधिकार देता है तो सत्ता को मर्यादा भी सिखाता है। इसलिए स्वतंत्रता दिवस केवल प्रधानमंत्री के भाषण, परेड और राष्ट्रगान का दिन नहीं है। यह आत्ममंथन का दिन भी है। आज राजनीतिक दल एक-दूसरे पर राष्ट्रविरोध, भ्रष्टाचार, परिवारवाद और लोकतंत्र को कमजोर करने के आरोप लगाते हैं। आरोपों की इस राजनीति में कहीं नागरिक पीछे छूट जाता है। चुनाव लोकतंत्र का उत्सव जरूर हैं, लेकिन लोकतंत्र सिर्फ चुनाव नहीं है। लोकतंत्र संसद में सवाल पूछने, मीडिया के स्वतंत्र रहने, न्यायपालिका की निष्पक्षता, संस्थाओं की विश्वसनीयता और नागरिक की असहमति के सम्मान से मजबूत होता है। असहमति लोकतंत्र की दुश्मन नहीं, उसकी आक्सीजन है। आज जरूरत इस बात की है कि हम राष्ट्रभक्ति को भी संकीर्ण अर्थों से बाहर निकालें। देश से प्रेम केवल नारे लगाने से साबित नहीं होता। सड़क पर गड्ढा देखकर सवाल करना भी देशभक्ति है। सरकारी स्कूल में शिक्षक की कमी पर आवाज उठाना भी देशभक्ति है। भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा होना भी देशभक्ति है। किसी गरीब के अधिकार के लिए लड़ना भी देशभक्ति है और सत्ता से सवाल पूछना भी देशभक्ति है। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य के लिए स्वतंत्रता दिवस का अर्थ और भी गहरा है। यहां तिरंगा उन गांवों में भी पहुंचना चाहिए जहां सड़क अभी सपना है, जहां युवा रोजगार के लिए मैदानों की ओर जा रहा है, जहां अस्पताल तक पहुंचने में घंटों लगते हैं और जहां पलायन धीरे-धीरे गांवों की सामाजिक संरचना बदल रहा है। देवभूमि की असली तरक्की केवल बड़े प्रोजेक्टों, चौड़ी सड़कों और पर्यटन के आंकड़ों से नहीं मापी जा सकती। असली विकास तब होगा जब पहाड़ का बच्चा अच्छी शिक्षा के लिए गांव छोड़ने को मजबूर न हो, मरीज को इलाज के लिए शहर की ओर न भागना पड़े और युवा रोजगार के लिए अपना घर न छोड़े। आजादी की 80वीं वर्षगांठ हमें यह याद दिलाती है कि देश केवल दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु या बड़े शहरों का नाम नहीं है। देश उन दूरस्थ गांवों का भी नाम है जहां एक बुजुर्ग आज भी उम्मीद लगाए बैठा है कि सरकार उसके दरवाजे तक पहुंचेगी। इसलिए इस स्वतंत्रता दिवस पर हमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि देश ने 79 वर्षों में क्या हासिल किया। हमें यह भी पूछना चाहिए कि अगले 20 वर्षों में हम कैसा भारत बनाना चाहते हैं। 2047 में जब स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होंगे, तब भारत दुनिया की बड़ी आर्थिक शक्ति हो सकता है। असली सवाल होगाकृक्या उस भारत में नागरिक अधिक स्वतंत्र, अधिक सुरक्षित, अधिक शिक्षित और अधिक सम्मानित होगा? आज तिरंगा हमें यही संदेश देता है कि सत्ता बदलती रहती है, सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन राष्ट्र और संविधान स्थायी होते हैं। इसलिए 80वें स्वतंत्रता दिवस पर सबसे बड़ा संकल्प यही होना चाहिए देश को केवल आर्थिक रूप से शक्तिशाली नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण, राजनीतिक रूप से जवाबदेह और लोकतांत्रिक रूप से मजबूत बनाना है। तिरंगा तभी सचमुच ऊंचा रहेगा, जब उसके नीचे खड़ा आखिरी नागरिक भी खुद को बराबर का भारतीय महसूस करेगा। यही आजादी का अर्थ है। यही स्वतंत्रता दिवस की असली कसौटी है।

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