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काकरोच के बाद अब ‘दिमागी नक्सल’ पार्टी

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  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तंज से निकली नई सियासी कहानी
  • बयान अब समर्थकों और विरोधियों की राजनीतिक पहचान
  • संसद से निकलकर राजनीति अब सोशल मीडिया में शिफ्ट
  • विरोधी पक्ष ऐसे बयानों को सत्ता के खिलाफ आक्रामक मुद्दा

देहरादून। भारतीय राजनीति में तंज, विशेषण और राजनीतिक जुमलों का इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है, लेकिन सोशल मीडिया के दौर में यही शब्द कभी-कभी सत्ता के खिलाफ नए राजनीतिक नैरेटिव का आधार भी बन जाते हैं। काकरोच जैसे राजनीतिक तंज के बाद अब दिमागी नक्सल शब्द भी इसी तरह चर्चा में है। प्रधानमंत्री की ओर से किए गए तंज के बाद इस नाम से एक राजनीतिक मंच/समूह के गठन और उससे बड़ी संख्या में लोगों के जुड़ने के दावे ने सियासी बहस को नया मोड़ दे दिया है। यह घटनाक्रम अपने आप में इस बात का संकेत है कि आज की राजनीति केवल संसद, रैलियों और चुनावी सभाओं तक सीमित नहीं रही। सोशल मीडिया पर बोले गए एक शब्द को समर्थक अपने तरीके से राजनीतिक पहचान में बदल सकते हैं और विरोधी उसी शब्द को सत्ता के खिलाफ हथियार बना सकते हैं।
राजनीति में किसी विरोधी को निशाना बनाने के लिए दिए गए विशेषण अक्सर कुछ समय के लिए सुर्खियां बनते हैं। लेकिन जब वही शब्द विरोध करने वाले समूह की पहचान बन जाए तो मामला दिलचस्प हो जाता है। दिमागी नक्सल को लेकर सामने आए राजनीतिक प्रयोग को भी इसी नजरिए से देखा जा रहा है। समर्थकों का दावा है कि प्रधानमंत्री के तंज के बाद बड़ी संख्या में लोग इस मंच से जुड़े हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि और संगठन की वास्तविक सदस्य संख्या को अलग-अलग तरीके से देखना जरूरी है। सवाल यह है कि क्या यह महज सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया है या फिर आने वाले समय में इसका कोई संगठित राजनीतिक रूप भी दिखाई देगा?
भारतीय राजनीति में कई बार किसी दल या नेता को दिए गए विरोधी के विशेषण ने ही उसकी पहचान को मजबूत किया है। राजनीतिक विरोधियों के आरोपों को पलटकर अपने पक्ष में इस्तेमाल करना चुनावी रणनीति का हिस्सा रहा है। दिमागी नक्सल को लेकर भी यही प्रयोग दिखाई देता है, जिस शब्द का इस्तेमाल आलोचना या तंज के रूप में किया गया, उसी को समर्थक राजनीतिक व्यंग्य और प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में पेश कर रहे हैं। यह सोशल मीडिया राजनीति के उस नए दौर को दिखाता है जहां नकारात्मक प्रचार भी कभी-कभी राजनीतिक ब्रांडिंग में बदल सकता है।
इस नए राजनीतिक मंच से लाखों लोगों के जुड़ने का दावा किया जा रहा है। अगर यह संख्या वास्तविक और सक्रिय राजनीतिक समर्थन में बदलती है तो निश्चित तौर पर यह मुख्यधारा की पार्टियों के लिए विचार करने का विषय होगा। लेकिन किसी डिजिटल प्लेटफार्म पर फालोअर या सदस्य संख्या और वास्तविक चुनावी समर्थन में बड़ा अंतर होता है। चुनाव बूथ पर लड़ा जाता है, जहां संगठन, उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दे और मतदाता का भरोसा निर्णायक होता है। यही इस नए राजनीतिक प्रयोग की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।
देश की राजनीति में भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबले के बीच कई छोटे राजनीतिक प्रयोग समय-समय पर सामने आते रहे हैं। कुछ आंदोलनों ने राजनीतिक दल का रूप लिया तो कुछ सोशल मीडिया की सीमाओं से आगे नहीं बढ़ पाए। दिमागी नक्सल नाम से सामने आया राजनीतिक प्रयोग भी अब इसी कसौटी पर देखा जाएगा। क्या यह केवल प्रधानमंत्री के बयान की प्रतिक्रिया तक सीमित रहेगा या बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, लोकतांत्रिक संस्थाओं और सामाजिक मुद्दों को लेकर अपना स्वतंत्र राजनीतिक एजेंडा तैयार करेगा? यदि यह मंच केवल एक राजनीतिक तंज का जवाब बनकर रह गया तो इसकी उम्र सीमित हो सकती है। लेकिन यदि यह अपने नाम से आगे निकलकर नीति, संगठन और जमीन से जुड़े मुद्दों पर स्पष्ट कार्यक्रम तैयार करता है, तब इसकी राजनीतिक प्रासंगिकता बढ़ सकती है।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि राजनीति में शब्दों को हल्के में लेना अब आसान नहीं है। सत्ता का एक तंज सोशल मीडिया में हजारों पोस्ट, मीम और अभियान का आधार बन सकता है और वही अभियान किसी दिन राजनीतिक संगठन का रूप लेने का दावा भी कर सकता है। लेकिन लोकतंत्र में अंततः फैसला नारों से नहीं, जनता के वोट से होता है। इसलिए दिमागी नक्सल नाम का यह प्रयोग कितना बड़ा राजनीतिक विकल्प बनता है, यह आने वाला समय बताएगा।
फिलहाल इतना जरूर है कि जिस शब्द को राजनीतिक तंज के रूप में इस्तेमाल किया गया, वही अब विरोध की पहचान बनने की कोशिश कर रहा है। काकरोच से लेकर दिमागी नक्सल तक की यह राजनीति बताती है कि भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक भाषा का नया दौर शुरू हो चुका हैकृजहां सत्ता का तंज भी कभी-कभी विपक्ष की नई कहानी लिख देता है।

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