उत्तराखंड को सड़क चाहिए, सुरंग चाहिए, बिजली चाहिए, पर्यटन चाहिए और रोजगार भी चाहिए। पहाड़ के विकास को रोकने की बात कोई नहीं कर रहा। लेकिन विकास की रफ्तार और पहाड़ की क्षमता के बीच संतुलन जरूरी है। सड़क चौड़ीकरण के नाम पर पहाड़ों की कटिंग, सुरंगों का निर्माण, जलविद्युत परियोजनाएं और निर्माण गतिविधियां यदि वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप न हों तो इसका सीधा असर पहाड़ की स्थिरता पर पड़ता है। उत्तराखंड के पहाड़ों में बारिश नई बात नहीं है। सदियों से पहाड़ बारिश को झेलते आए हैं। नदियां उफनती रही हैं, पहाड़ दरकते रहे हैं और रास्ते भी बंद होते रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जिस तेजी से भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं, उसने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है क्या अब पहाड़ सिर्फ बारिश से नहीं, बल्कि हमारी विकास नीति से भी कमजोर हो रहा है? चमोली इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने है। मानसून में जिले के कई हिस्सों में सड़क पर मलबा आना, पहाड़ों से पत्थर गिरना और सड़कें धंसना लगातार जारी है। बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग से लेकर ग्रामीण संपर्क मार्गों तक यातायात बाधित होना अब जैसे मानसून की स्थायी तस्वीर बनती जा रही है। समस्या यह नहीं कि बारिश में सड़क बंद क्यों हुई। असली सवाल यह है कि हर साल उन्हीं स्थानों पर सड़क क्यों टूटती है और हर साल उन्हीं स्थानों पर भूस्खलन क्यों होता है? भूस्खलन होते ही प्रशासन और संबंधित विभाग सक्रिय हो जाते हैं। जेसीबी मशीनें पहुंचती हैं। मलबा हटता है। सड़क खुलती है और व्यवस्था राहत की सांस लेती है। लेकिन अगली बारिश में फिर वही कहानी दोहराई जाती है। यह व्यवस्था आपदा प्रबंधन तो हो सकती है, स्थायी समाधान नहीं। चमोली जैसे संवेदनशील जिले में अब हर भूस्खलन के बाद केवल मलबा हटाने के बजाय उसका वैज्ञानिक अध्ययन होना चाहिए। यह पता लगाया जाना चाहिए कि पहाड़ दरका क्यों? पानी का निकास कहां बाधित हुआ? सड़क निर्माण में कहां गलती हुई? ढलान को सुरक्षित करने के लिए क्या उपाय किए गए थे? यदि इन सवालों के जवाब नहीं खोजे गए तो जेसीबी आती-जाती रहेंगी और पहाड़ टूटते रहेंगे। यह बात अब केवल पर्यावरणविदों की चिंता नहीं रह गई है। लगातार बढ़ती आपदाएं इसे आम आदमी की समस्या बना चुकी हैं। पहाड़ को सड़क के लिए काटना पड़े तो काटिए, लेकिन यह भी तय कीजिए कि काटने के बाद पहाड़ को संभालेंगे कैसे। सड़क बंद होने की खबर अखबार में कुछ पंक्तियों की खबर बन जाती है। लेकिन जिस गांव का संपर्क सड़क टूटने से बंद होता है, उसके लिए यह पूरी जिंदगी का संकट है। किसी बीमार व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाना हो, बच्चे को स्कूल जाना हो, किसान को अपनी उपज बाजार तक पहुंचानी हो या गांव में जरूरी सामान पहुंचाना होकृसड़क ही जीवन की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। इसलिए भूस्खलन को केवल सड़क विभाग की समस्या मानना भूल होगी। यह स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और ग्रामीण जीवन से जुड़ा सवाल है। मौसम विभाग बारिश की चेतावनी देता है। प्रशासन संवेदनशील क्षेत्रों को लेकर अलर्ट जारी करता है। फिर भी कई बार हादसे हो जाते हैं। इसका मतलब यह है कि चेतावनी और जमीन पर तैयारी के बीच कहीं न कहीं बड़ा अंतर है। चमोली में संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर वहां पहले से मशीनरी, बचाव दल और जरूरी संसाधन तैनात किए जा सकते हैं। भूस्खलन वाले क्षेत्रों में यातायात रोकने के लिए स्पष्ट प्रोटोकाल होना चाहिए। स्थानीय ग्रामीणों को भी यह जानकारी होनी चाहिए कि खतरे की स्थिति में उन्हें कहां जाना है और किससे संपर्क करना है। आपदा प्रबंधन का मतलब सिर्फ हादसे के बाद राहत पहुंचाना नहीं, हादसे से पहले खतरा कम करना भी है। उत्तराखंड में विकास का सबसे बड़ा पैमाना सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि कितनी सड़क बनी और कितने पुल तैयार हुए। यह भी देखा जाना चाहिए कि निर्माण के बाद कितने गांव सुरक्षित रहे, कितने जलस्रोत बचे और पहाड़ की प्राकृतिक संरचना कितनी सुरक्षित रही। चमोली बार-बार संकेत दे रहा है। पहाड़ की दरारें केवल भूगर्भीय घटना नहीं हैं, वे चेतावनी भी हैं। सरकार को अब भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों का स्थायी वैज्ञानिक उपचार, संवेदनशील सड़कों का नियमित भूगर्भीय ऑडिट और निर्माण परियोजनाओं की सख्त निगरानी सुनिश्चित करनी होगी। स्थानीय लोगों के अनुभव को भी योजना का हिस्सा बनाना होगा, क्योंकि पहाड़ को जितना वैज्ञानिक समझ सकता है, उतना ही वह व्यक्ति भी समझता है जिसने पूरी जिंदगी उसी पहाड़ पर बिताई है। बारिश को रोकना हमारे हाथ में नहीं है। लेकिन बारिश के बाद होने वाली तबाही को कम करना जरूर हमारे हाथ में है। चमोली की घटनाएं इसलिए सिर्फ चमोली की खबर नहीं हैं। यह पूरे उत्तराखंड के लिए चेतावनी हैं। अगर हर बरसात के बाद वही सड़क टूटती है, वही पहाड़ दरकता है और वही जेसीबी मलबा हटाती है, तो समस्या बारिश में नहीं, हमारी तैयारी में है। अब समय है कि उत्तराखंड हादसों का इंतजार करने के बजाय खतरे को पहले पहचाने। क्योंकि पहाड़ को बचाना सिर्फ पर्यावरण का सवाल नहीं है यह उत्तराखंड के भविष्य को बचाने का सवाल है।




