छात्रों की वापसी पर भी राजनीति

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यह राजनीति का कौन सा और कैसा रूप है? जहां हर मुद्दा राजनीतिक मुद्दा बना दिया जाता है। पक्ष—विपक्ष के बीच किन मुद्दों पर राजनीति की जानी चाहिए और किन मुद्दों पर नहीं इसके लिए भले ही कोई सीमा रेखा तय न सही लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवीय सुरक्षा और सहायता जैसे मुद्दों पर भी क्या राजनीति होनी चाहिए? यह सवाल आज इसलिए उठाए जा रहे हैं क्योंकि देश के नेताओं ने अपने राजनीतिक हितों के लिए सारी सीमाएं तोड़ दी है। इन दिनों यूक्रेन में फंसे छात्रों की वापसी पर जिस तरह की राजनीति की जा रही है उस पर यूक्रेन में फंसे एक छात्र ने वीडियो मैसेज में देश के नेताओं से इस मुद्दे पर राजनीति न करने और छात्रों की सुरक्षित वापसी के लिए प्रयास करने की अपील की गई है। अभी कुछ कांग्रेसी नेताओं द्वारा भाजपा और केंद्र सरकार पर आरोप लगाए गए थे कि उनकी लापरवाही के कारण ही अब यूक्रेन में फंसे छात्रों की जान पर संकट बना है। अगर सरकार ने समय रहते सही कदम उठाए होते तो यह स्थिति नहीं पैदा होती। कुछ अन्य नेताओं ने पीएम और अन्य मंत्रियों के लिए उत्तर प्रदेश की चुनावी रैलियों को अधिक महत्वपूर्ण बताते हुए कहा गया है कि उनके लिए छात्रों की जान की सुरक्षा की कोई परवाह नहीं है। उन्हें तो बस उत्तर प्रदेश में चुनावी जीत की चिंता है। विपक्ष के इस प्रहार पर भला भाजपा नेता भी कैसे चुप रह सकते हैं खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कल यूक्रेन से लौटे छात्रों से मुलाकात में यह कहकर कि अगर पूर्ववर्ती सरकारों ने मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में कुछ काम किया होता तो उन्हें मेडिकल की पढ़ाई करने के लिए यूक्रेन नहीं जाना पड़ता। उनका कहना था कि वह देश में अब सस्ती मेडिकल शिक्षा मिल सके इस पर काम करेंगे? सवाल यह है कि बीते 7 सालों से देश में उनकी सरकार है उन्होंने अब तक ऐसा क्यों नहीं किया। इन दिनों 4 केंद्रीय मंत्री यूक्रेन के पड़ोसी देशों में छात्रों की वापसी पर काम कर रहे हैं वही दिल्ली, मुंबई आने वाली उन फ्लाइटों जिनसे यह छात्र आ रहे हैं उन्हें रिसीव करने में भी सरकार के मंत्री लगे हैं। जो इन छात्रों से वंदे मातरम के नारे लगवा रहे हैं। यहां तक तो ठीक है लेकिन एक मंत्री तो इन छात्रों से नरेंद्र मोदी जिंदाबाद के नारे भी लगवा रहे हैं। इस वीडियो में देखा जा सकता है कि छात्र वंदे मातरम के नारे तो लगाते हैं लेकिन जब मंत्री श्रीमान नरेंद्र मोदी जिंदाबाद के नारे लगाते हैं तो वह खामोश दिखते हैं। यह कैसी राजनीति है? प्रचार का कौन सा तरीका है। अभी बीते दिनों पाक के खिलाफ की गई एयर स्ट्राइक पर विपक्ष ने सवाल खड़े किए और भाजपा ने इसे चुनावी जनसभाओं में मुद्दा बनाया। कश्मीर से धारा 370 को हटाए जाने जैसे मुद्दों पर देश के नेताओं और दलों में सर्वसम्मति नहीं देखी गई। हर मुद्दे पर राजनीति और सिर्फ राजनीति, मुद्दा चाहे राष्ट्रीय सुरक्षा का हो या मानवीय सुरक्षा का। क्या अब राजनीति का स्तर इतना गिर चुका है कि नेताओं के लिए चुनावी जीत ही राजनीति का पर्याय बन चुकी है? निश्चित ही यह अत्यंत चिंतनीय है। अपने प्रचार से ज्यादा अभी उन हजारों बच्चों की वापसी ज्यादा जरूरी है जो यूक्रेन में युद्ध की विभीषिका में फंसे हैं।

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