November 2, 2026चुनाव में धांधली केवल मतदान केंद्र पर नहीं होती, उसकी शुरुआत मतदाता सूची से भी हो सकती है। किसी पात्र मतदाता का नाम जानबूझकर काट देना, अपात्र नाम को सूची में बनाए रखना या नियमों को ताक पर रखकर मतदाता विवरण में बदलाव करना लोकतंत्र की जड़ों पर चोट है। मतदान का अधिकार तभी सार्थक है, जब मतदाता का नाम सूची में सुरक्षित हो और उसे बिना किसी बाधा के अपने मताधिकार का प्रयोग करने का अवसर मिले। इसलिए मतदाता सूची में जानबूझकर गड़बड़ी करने वालों के विरुद्ध निलंबन और दंडात्मक कार्रवाई की व्यवस्था को गंभीरता से लागू करना आवश्यक है। हालांकि, चुनाव आयोग के फैसले और दंड संबंधी प्रविधानों का सटीक दायरा आधिकारिक आदेश से ही स्पष्ट होना चाहिए। लोकतंत्र की विडंबना देखिए कि चुनाव में एक-एक वोट की अहमियत पर राजनीतिक दल बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन उसी वोट की पात्रता तय करने वाली मतदाता सूची में त्रुटियां सामने आने पर जिम्मेदारी से बचने की कोशिश भी होती है। मतदाता सूची में नाम होना किसी नागरिक पर एहसान नहीं, उसका लोकतांत्रिक अधिकार है। इस अधिकार की रक्षा करना चुनावी तंत्र की जिम्मेदारी है। यदि कोई अधिकारी या कर्मचारी अपने पद का दुरुपयोग करके इस व्यवस्था को प्रभावित करता है, तो उसे सामान्य प्रशासनिक लापरवाही मानकर छोड़ना लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ समझौता होगा। चुनाव आयोग की सख्ती का संदेश स्पष्ट होना चाहिएकृमतदाता सूची किसी अधिकारी की निजी जागीर नहीं है और न ही इसे राजनीतिक सुविधा के अनुसार बदलने की छूट दी जा सकती है। पात्र मतदाता का नाम हटाने या किसी अपात्र प्रविष्टि को जानबूझकर बनाए रखने जैसी अनियमितताएं प्रमाणित होती हैं, तो दोषी के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई होनी चाहिए। केवल चेतावनी देकर मामला निपटा देना पर्याप्त नहीं होगा। जहां कानून दंड का प्रविधान करता है, वहां उसका निष्पक्ष और समान रूप से पालन भी होना चाहिए। लेकिन कार्रवाई का भय पैदा करना ही पर्याप्त नहीं है। असली सवाल यह है कि ऐसी गड़बड़ियां होती कैसे हैं और उन्हें रोकने के लिए व्यवस्था कितनी सक्षम है? मतदाता सूची के पुनरीक्षण में यदि बड़ी संख्या में नामों का सत्यापन किया जा रहा है, तो हर नाम के साथ पर्याप्त सावधानी बरतनी होगी। तकनीकी त्रुटि, दस्तावेजों की कमी और जानबूझकर की गई हेराफेरी के बीच स्पष्ट अंतर किया जाना चाहिए। बिना जांच किसी को दोषी ठहराना भी उतना ही अनुचित है, जितना प्रमाणित गड़बड़ी पर आंखें मूंद लेना। विशेष गहन पुनरीक्षण जैसी व्यापक प्रक्रियाओं में यह चुनौती और गंभीर हो जाती है। बड़ी संख्या में मतदाताओं के विवरण की जांच करते समय प्रशासनिक सुविधा को नागरिक के अधिकार से ऊपर नहीं रखा जा सकता। किसी व्यक्ति का नाम सूची से हटाना महज एक आंकड़ा कम करना नहीं है। इसका सीधा असर उसके मतदान के अधिकार पर पड़ सकता है। इसलिए नाम हटाने की प्रक्रिया में निर्धारित नियमों, उचित सत्यापन, सूचना और दावा-आपत्ति के अवसरों का पालन अनिवार्य होना चाहिए। किसी पात्र नागरिक को केवल इसलिए अपने मताधिकार से वंचित नहीं होना चाहिए कि वह समय पर किसी जटिल प्रशासनिक प्रक्रिया को पूरा नहीं कर पाया। इस मामले में राजनीतिक दलों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। मतदाता सूची में गड़बड़ी का आरोप लगाकर राजनीतिक लाभ उठाना जितना आसान है, प्रमाणों के साथ शिकायत दर्ज कराना और निष्पक्ष जांच में सहयोग करना उतना ही जरूरी है। चुनाव आयोग को भी किसी शिकायत को केवल राजनीतिक बयान मानकर खारिज नहीं करना चाहिए। आरोप चाहे सत्ता पक्ष लगाए या विपक्ष, जांच का पैमाना एक ही होना चाहिए। लोकतंत्र में चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता आरोपों के शोर से नहीं, तथ्यों और निष्पक्ष कार्रवाई से मजबूत होती है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि मतदाता सूची की शुद्धता के नाम पर किसी वर्ग, समुदाय, क्षेत्र या राजनीतिक विचारधारा से जुड़े नागरिकों के साथ भेदभाव न हो। नियम सबके लिए समान हों और किसी भी पात्र मतदाता को अनावश्यक संदेह के आधार पर परेशान न किया जाए। पारदर्शिता का अर्थ केवल नामों की जांच करना नहीं, बल्कि हर बदलाव का स्पष्ट आधार उपलब्ध कराना और प्रभावित नागरिक को अपनी बात रखने का अवसर देना भी है। चुनाव आयोग को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मतदाता अपने नाम की स्थिति आसानी से जांच सकें, त्रुटि होने पर समयबद्ध सुधार करा सकें और अनुचित विलोपन के विरुद्ध प्रभावी शिकायत दर्ज कर सकें। साथ ही, मतदाता सूची तैयार करने वाले अधिकारियों के काम का नियमित परीक्षण हो तथा जहां जानबूझकर नियमों का उल्लंघन प्रमाणित हो, वहां जिम्मेदारी तय करने में देर न की जाए। तकनीक, निगरानी और जवाबदेही का ऐसा तंत्र विकसित करना होगा, जिसमें गलती पकड़ना आसान और गड़बड़ी छिपाना मुश्किल हो। आखिरकार, निष्पक्ष चुनाव का दावा तभी विश्वसनीय होगा, जब चुनाव की पहली सीढ़ी यानी मतदाता सूची ही निष्पक्ष हो। मतदान केंद्र पर सुरक्षा बढ़ाने और चुनावी आचार संहिता लागू करने का कोई अर्थ नहीं, यदि किसी पात्र नागरिक का नाम सूची में ही नहीं है। मतदाता सूची में गड़बड़ी करने वालों पर कार्रवाई इसलिए जरूरी है कि लोकतंत्र में किसी अधिकारी, कर्मचारी या राजनीतिक दल को नागरिक के मताधिकार से खिलवाड़ करने का अधिकार नहीं है। लोकतंत्र में मतदाता का वोट सत्ता की ताकत तय करता है, इसलिए उस वोट तक पहुंचने का रास्ता किसी भी कीमत पर बाधित नहीं होना चाहिए। चुनाव आयोग की सख्ती तभी सार्थक होगी, जब वह केवल दंड का संदेश न दे, बल्कि यह भरोसा भी कायम करे कि हर पात्र मतदाता का नाम सुरक्षित रहेगा, हर शिकायत की निष्पक्ष जांच होगी और दोषी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, कानून से ऊपर नहीं होगा। मतदाता सूची से खिलवाड़ करने वालों के लिए सख्ती जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है ऐसी निष्पक्ष व्यवस्था, जिसमें लोकतंत्र के सबसे बुनियादी अधिकार की रक्षा किसी अपवाद के बजाय नियम बने।