उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की आहट के बीच धामी सरकार की प्राथमिकताओं में युवा पीढ़ी का महत्व बढ़ना स्वाभाविक है। भराड़ीसैंण में पेश अनुपूरक बजट में जेनजी यानी नई पीढ़ी को केंद्र में रखने की झलक दिखाई देती है। यह केवल बजट के प्रावधानों का सवाल नहीं, बल्कि उस युवा वर्ग की आकांक्षाओं को समझने की चुनौती भी है, जो रोजगार, पारदर्शिता, बेहतर शिक्षा और भविष्य की सुरक्षा चाहता है। चुनावी वर्ष में युवाओं पर सरकार का यह फोकस राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, लेकिन इसकी वास्तविक सफलता घोषणाओं से नहीं, जमीन पर दिखाई देने वाले परिणामों से तय होगी। उत्तराखंड की राजनीति में युवा हमेशा से निर्णायक भूमिका में रहे हैं। अलग राज्य की मांग के पीछे भी बेहतर भविष्य, रोजगार और पहाड़ में सम्मानजनक जीवन की आकांक्षा थी। राज्य गठन के 26 वर्ष बाद भी यदि युवाओं को अवसरों की तलाश में दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ता है तो यह विकास के दावों के सामने बड़ा प्रश्न है। ऐसे में नई पीढ़ी को साधने की किसी भी सरकारी पहल का मूल्यांकन इसी कसौटी पर होना चाहिए कि वह युवाओं के जीवन में कितना वास्तविक बदलाव ला रही है। आज का युवा केवल योजनाओं की सूची या सरकारी आश्वासनों से संतुष्ट होने वाला नहीं है। उसके सामने प्रतियोगी परीक्षाओं की अनिश्चितता, भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, निजी क्षेत्र में सीमित अवसर, कौशल के अनुरूप काम और स्वरोजगार के लिए पूंजी जैसी व्यावहारिक चुनौतियां हैं। इंटरनेट और सामाजिक माध्यमों के विस्तार ने उसे सूचना के प्रति सजग बनाया है। वह सरकार के दावों की तुलना आंकड़ों और अनुभवों से करता है। यही कारण है कि जेनजी को केंद्र में रखने वाली नीतियों में संवाद, जवाबदेही और समयबद्ध क्रियान्वयन का महत्व किसी भी बजटीय घोषणा से कम नहीं है। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य के लिए युवा नीति का अर्थ मैदानी क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाने तक सीमित नहीं हो सकता। पहाड़ के गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, संचार और बाजार की सुविधाओं को मजबूत किए बिना पलायन की समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। स्थानीय संसाधनों पर आधारित उद्योग, पर्यटन, कृषि, बागवानी, जड़ी-बूटी, हस्तशिल्प और डिजिटल सेवाओं में रोजगार के नए अवसर पैदा करने होंगे। युवाओं को केवल नौकरी खोजने वाला नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र में रोजगार सृजित करने में सक्षम बनाना होगा। यह भी ध्यान रखना होगा कि जेनजी कोई एकरूप समूह नहीं है। शहरों में पढ़ने वाले युवाओं की जरूरतें पहाड़ के दूरस्थ गांवों में रहने वाले युवाओं से अलग हैं। तकनीकी शिक्षा प्राप्त युवाओं की अपेक्षाएं और पारंपरिक आजीविका से जुड़े परिवारों के युवाओं की चुनौतियां भी समान नहीं हैं। इसलिए सरकार की प्राथमिकता ऐसी योजनाएं होनी चाहिए, जिनका लाभ सामाजिक और भौगोलिक असमानताओं के कारण पीछे छूट रहे युवाओं तक भी पहुंचे। बजट में धन का प्रावधान तभी सार्थक होगा, जब उसके उपयोग, लाभार्थियों और परिणामों का स्पष्ट हिसाब सामने आए। चुनावी वर्ष में युवाओं पर बढ़ता ध्यान सत्ता पक्ष की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है। लोकतंत्र में चुनाव से पहले सरकारों का अपनी प्राथमिकताओं की समीक्षा करना अस्वाभाविक नहीं है। समस्या तब पैदा होती है, जब नीतियां दीर्घकालिक जरूरतों के बजाय तात्कालिक राजनीतिक लाभ से संचालित होने लगती हैं। युवा वर्ग को यदि केवल चुनावी समर्थन जुटाने का माध्यम समझा गया तो यह अवसर हाथ से निकल सकता है। इसके विपरीत, यदि सरकार युवाओं की समस्याओं को शासन की स्थायी प्राथमिकता बनाती है तो उसका लाभ चुनावी गणित से कहीं आगे तक जाएगा। अनुपूरक बजट में जेनजी पर फोकस की झलक को इसी संदर्भ में देखना चाहिए। बजट का आकार या घोषणाओं की संख्या अपने आप में उपलब्धि नहीं होती। महत्वपूर्ण यह है कि आवंटित धन का कितना हिस्सा निर्धारित समय में खर्च होता है, कितने युवाओं को प्रशिक्षण के बाद वास्तविक रोजगार मिलता है, कितने नए उद्यम खड़े होते हैं और पहाड़ के कितने गांवों में आजीविका के अवसर बढ़ते हैं। इन सवालों के जवाब ही सरकारी मंशा और उसके परिणामों के बीच की दूरी को स्पष्ट करेंगे। धामी सरकार के सामने अवसर भी है और चुनौती भी। युवा आबादी को राज्य की सबसे बड़ी ताकत में बदलने के लिए उसे रोजगार, शिक्षा, कौशल और उद्यमिता को एक-दूसरे से जोड़ना होगा। भर्ती प्रक्रिया में भरोसा बहाल करना, सरकारी योजनाओं की जानकारी सरलता से उपलब्ध कराना और युवाओं की शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई करना भी उतना ही जरूरी है। सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि बजट का लाभ केवल बड़े शहरों और पहले से सक्षम वर्ग तक सीमित न रह जाए। आखिरकार, उत्तराखंड का युवा भविष्य की संभावना है, केवल चुनावी आंकड़ा नहीं। अनुपूरक बजट में उसकी चिंता दिखाई देना सकारात्मक संकेत हो सकता है, लेकिन असली परीक्षा अब क्रियान्वयन की है। सरकार यदि इस अवसर को ठोस रोजगार, पारदर्शी व्यवस्था और स्थानीय विकास में बदल पाती है तो जेनजी का भरोसा जीतने की दिशा में आगे बढ़ेगी। अन्यथा चुनावी साल में दिखाई दिया यह फोकस बजट के पन्नों तक ही सिमटकर रह जाएगा।





