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बेमौसम बारिश, बेबस व्यवस्था

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मौसम बदल रहा है, बारिश का मिजाज बदल रहा है, आपदाओं का स्वरूप बदल रहा है, लेकिन हमारी व्यवस्था की कार्यशैली नहीं बदल रही। बेमौसम बारिश एक बार फिर प्रकृति की अनिश्चितता और सरकारी तैयारियों के दावों के बीच का अंतर उजागर कर रही है। खेतों में किसान की मेहनत पर पानी फिर रहा है, सड़कों पर आवाजाही संकट में पड़ रही है और आम आदमी की दिनचर्या अस्त-व्यस्त हो रही है। इसके बावजूद सवाल वही पुराना हैकृक्या हमारी सरकारें हर संकट के बाद नुकसान गिनने और राहत के आश्वासन देने के लिए ही तैयार रहती हैं, या संकट आने से पहले उससे निपटने की भी कोई ठोस व्यवस्था है? उत्तराखंड में यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है। पहाड़ की भौगोलिक संवेदनशीलता, कमजोर संपर्क मार्ग, सीमित कृषि भूमि और गांवों तक पहुंचने वाली बुनियादी सुविधाओं की चुनौतियां किसी से छिपी नहीं हैं। यहां बारिश केवल छाता निकालने या कुछ घंटे घर में बैठने का मामला नहीं है। कई इलाकों में यह सड़क संपर्क टूटने, खेतों को नुकसान पहुंचने और रोजमर्रा की जरूरतों तक पहुंच बाधित होने का कारण बन सकती है। इसके बावजूद हर बार बारिश के बाद वही तस्वीर सामने आती है। कहीं रास्ते बाधित, कहीं जलभराव, कहीं नुकसान का आकलन और कहीं मदद की प्रतीक्षा करते लोग। बेमौसम बारिश का सबसे बड़ा प्रहार किसान पर पड़ता है। पहले खेती की लागत बढ़ती है, फिर जंगली जानवरों से फसल बचाने की चुनौती, ऊपर से बाजार में उपज का उचित मूल्य मिलने की अनिश्चितता। इन तमाम मुश्किलों के बीच किसान आसमान की ओर देखकर अपनी फसल बचने की उम्मीद करता है। जब मौसम ही साथ छोड़ दे, तो उसकी महीनों की मेहनत और पूरे परिवार की आर्थिक योजना संकट में पड़ जाती है। छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह नुकसान केवल फसल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अगले कृषि चक्र की तैयारी और परिवार की जरूरतों को भी प्रभावित करता है। विडंबना यह है कि किसान को खेती के लिए प्रोत्साहित करने वाले भाषणों की कमी नहीं, लेकिन प्राकृतिक आपदा के बाद उसे समय पर राहत मिले, इसकी गारंटी कमजोर दिखाई देती है। नुकसान का आकलन करने वाली प्रक्रिया यदि लंबी हो, सहायता के लिए कागजी औपचारिकताएं भारी पड़ें और मुआवजे में देरी हो, तो सरकारी मदद का उद्देश्य ही कमजोर हो जाता है। किसान को आश्वासन नहीं, समय पर सहायता चाहिए। उसे ऐसी व्यवस्था चाहिए, जो नुकसान होने के बाद उसकी विवशता का सर्वेक्षण भर न करे, बल्कि उसे दोबारा खड़े होने का आधार भी दे। उत्तराखंड के संदर्भ में समस्या केवल मौसम की नहीं, विकास की दिशा और नियोजन की भी है। पहाड़ों में निर्माण, सड़क चौड़ीकरण, जल निकासी और ढलानों की स्थिरता जैसे विषयों पर पर्याप्त सावधानी नहीं बरती गई, तो बारिश का असर और गंभीर हो सकता है। मैदानों में नालों और प्राकृतिक जल निकासी के रास्तों पर अतिक्रमण तथा अनियोजित निर्माण जलभराव की समस्या बढ़ा सकते हैं। यह मान लेना आसान है कि बारिश असामान्य थी, इसलिए नुकसान हुआ। लेकिन हर बार मौसम को दोष देकर व्यवस्था की जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता। जहां मानवीय लापरवाही नुकसान बढ़ाती है, वहां जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। आपदा प्रबंधन की असली परीक्षा प्रेस विज्ञप्तियों, बैठकों और समीक्षा के दौरों में नहीं होती। उसकी परीक्षा तब होती है, जब किसी गांव का संपर्क टूटता है, किसी किसान की फसल बर्बाद होती है या किसी सड़क पर आवाजाही जोखिमपूर्ण हो जाती है। सवाल यह है कि संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कितनी प्रभावी है? नालों की सफाई समय पर हुई या नहीं? सड़कों और पुलों की सुरक्षा का नियमित निरीक्षण किया गया या नहीं? चेतावनी मिलने के बाद स्थानीय प्रशासन ने क्या कदम उठाए? इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए। जवाबदेही के बिना आपदा प्रबंधन भी एक सरकारी औपचारिकता बनकर रह जाता है। यह भी समझना होगा कि मौसम का पूर्वानुमान जारी कर देना ही जिम्मेदारी पूरी कर देना नहीं है। चेतावनी तभी उपयोगी है, जब वह समय पर किसान, ग्रामीण, यात्री और स्थानीय प्रशासन तक पहुंचे तथा उसके आधार पर कार्रवाई हो। मौसम विभाग की सूचना के बाद भी यदि जोखिम वाले क्षेत्रों में आवश्यक सावधानी नहीं बरती जाती, तो सूचना तंत्र और प्रशासनिक कार्रवाई के बीच की खाई पर सवाल उठना स्वाभाविक है। सरकार को बताना चाहिए कि चेतावनियों को जमीन पर उतारने के लिए क्या व्यवस्था है और उसकी निगरानी कौन करता है। बदलते मौसम के दौर में सरकारों को अपनी प्राथमिकताएं भी बदलनी होंगी। विकास का अर्थ केवल नई सड़कों का निर्माण, बड़ी परियोजनाओं की घोषणा या निवेश के आंकड़े प्रस्तुत करना नहीं है। विकास का असली अर्थ ऐसी सड़कें, ऐसी जल निकासी व्यवस्था, ऐसी कृषि नीति और ऐसा प्रशासनिक ढांचा तैयार करना है, जो संकट के समय लोगों का साथ दे सके। यदि हर बारिश के बाद सड़कें क्षतिग्रस्त हों, खेतों में नुकसान हो और लोगों को राहत के लिए भटकना पड़े, तो विकास के दावों की समीक्षा जरूरी हो जाती है। जलवायु परिवर्तन और चरम मौसमी घटनाओं के जोखिम को भी अब गंभीरता से लेना होगा। हर असामान्य बारिश को बिना वैज्ञानिक प्रमाण जलवायु परिवर्तन का परिणाम बताना उचित नहीं, लेकिन बदलती मौसमी परिस्थितियों के बीच जोखिम कम करने की तैयारी टालना भी समझदारी नहीं है। उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य में स्थानीय मौसम के आंकड़ों, भौगोलिक परिस्थितियों और पुराने नुकसान के आधार पर दीर्घकालिक योजनाएं बननी चाहिए। खेती को मौसम के अनुकूल बनाने, जल निकासी सुधारने, ढलानों की सुरक्षा करने और आपातकालीन सेवाओं को मजबूत करने में निवेश किया जाना चाहिए। सरकार को अब स्पष्ट समयसीमा के साथ कार्रवाई करनी होगी। प्रभावित फसलों का पारदर्शी सर्वेक्षण हो, पात्र किसानों को समय पर सहायता मिले, संवेदनशील सड़कों और पुलों का सुरक्षा परीक्षण हो तथा जल निकासी व्यवस्था की जिम्मेदारी तय की जाए। जिन विभागों का काम केवल कागजों में पूरा होता है, उनके प्रदर्शन की समीक्षा भी होनी चाहिए। आपदा के बाद राहत देना आवश्यक है, लेकिन उससे कहीं अधिक जरूरी है कि पहले से किए जा सकने वाले उपायों में लापरवाही न हो। प्रकृति के सामने मनुष्य की सीमाएं हैं, लेकिन प्रशासनिक लापरवाही को प्रकृति की मजबूरी बताकर छिपाया नहीं जा सकता। बारिश कब और कितनी होगी, इस पर हमारा नियंत्रण नहीं है। लेकिन उससे निपटने की तैयारी, समय पर चेतावनी, सुरक्षित निर्माण, किसानों की सहायता और राहत व्यवस्था की गति हमारे नियंत्रण में हैं। बेमौसम बारिश ने मौसम का मिजाज दिखाया है, अब सरकार को अपनी कार्यशैली का हिसाब देना चाहिए। हर बार बारिश के बाद जागना, नुकसान गिनना और राहत का भरोसा देना पर्याप्त नहीं है। जनता को ऐसी व्यवस्था चाहिए, जो संकट के समय दिखाई दे, सिर्फ कागजों और घोषणाओं में नहीं, जमीन पर। क्योंकि सवाल बारिश का नहीं, उस व्यवस्था का है जो हर नई चुनौती के सामने पुरानी गलतियां दोहराती है।

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