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अंतर कलह शिकार भाजपा

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बात चाहे भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र की एनडीए सरकार की हो या फिर किसी भी भाजपा शासित राज्य की, भाजपा ने सिंगल, डबल और ट्रिपल इंजन सरकारों के गठन तथा एक दशक से मोदी है तो मुमकिन है, के फलसफे पर सवार भाजपा ने जीतेगी तो भाजपा ही, जैसे नामुमकिन असत्य को सत्य में तब्दील करने का करिश्मा कर दिखाया हो लेकिन सत्ता के दम्भ ने भाजपा को अब उस मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया है कि उसे विपक्षी हमलों से ज्यादा अपनी आंतरिक गुटबाजी व अंतर्कलह से निपटना भी भारी पड़ रहा है। जिस रीति नीति के जरिए भाजपा ने यह मुकाम हासिल किया था वहीं अब उसके लिए सर दर्द बन चुकी है। बात उत्तराखंड की की जाए तो राज्य के माननीय विधायकों और मंत्रियों तथा पार्टी पदाधिकारियों के कारण सूबे की सरकार तथा सीएम धामी को आए दिन ऐसी तमाम स्थितियों से दो—चार होना पड़ रहा है जो सरकार और पार्टी की छवि को खराब कर रही हैं। ताजा प्रकरण प्राथमिक शिक्षा विभाग के निदेशक पर हुआ हमला इसका एक उदाहरण है। भले ही इस मामले में दोनों पक्षों द्वारा पुलिस थाने में एक एफआईआर दर्ज कराई गई हो तथा पुलिस द्वारा विधायक के साथ गए कुछ लोगों को हिरासत में लिया गया हो अथवा भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भटृ यह कह रहे हो कि जब विधायक ने माफी मांग ली तो मामला खत्म हो जाना चाहिए इस पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए। लेकिन क्या उनके यह कहने भर से ही सब कुछ ठीक हो जाएगा? इस मुद्दे को लेकर शिक्षक संघ और कर्मचारी संगठन अभी भी विधायक पर कार्रवाई न होने को लेकर नाराज है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि राजनीति कौन कर रहा है और राजनीति क्यों की जा रही है। राजनीति करने में विपक्ष तो महज एक मुखौटा भर है। असल में राजनीति का केंद्र तो भाजपा के अंदर ही है जिस पर अब न तो महेंद्र भटृ का कोई नियंत्रण है और न सीएम पुष्करण सिंह धामी का। यह कोई पहला मुद्दा नहीं है अभी इससे पूर्व अंकिता भंडारी हत्याकांड में जो वीआईपी का जिन्न बोतल से बाहर निकल कर आया था जिसने दिल्ली से दून तक पूरी बीजेपी को जकझोर कर रख दिया था वह भी विपक्ष की नहीं खुद भाजपा नेताओं की करतूत का नमूना था। जिसमें महेंद्र भटृ तक को लपेटे में ले लिया गया था। सीबीआई जांच के आदेश के बाद भी इसने अभी तक भाजपा का पीछा नहीं छोड़ा है। बात चाहे पेपर लीक मामले की हो जिसकी जांच की सीबीआई संस्तुति करने पर सरकार को विवश होना पड़ा। अथवा गदरपुर विधायक और पूर्व शिक्षा मंत्री अरविंद पांडे के द्वारा उठाए जाने वाले उन सवालों की जो सरकार को असहज करते रहे हैं। यही बात चाहे किसी माननीय द्वारा आय से अधिक संपत्तियां जुटाने की हो और जांच अथवा गैरसैंण की राजधानी बनाने के फैसले और जगह के चुनाव पर सवाल उठाने वाले विधायक की और उनके समर्थन में पत्रकारों से यह कहने वाले धर्मपुर विधायक की क्या आप अपने 80 साल के बुजुर्ग पिता को ऐसी जगह में भेज सकते हैं। भाजपा की नीति रीतियों व कामकाज पर सवाल उठाने वालों पर भाजपा ने ही कोई कार्रवाई कभी नहीं की तो और किसी की जरूरत भी क्या है।

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