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सब्सिडीः मतलब सब गोलमाल

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केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा गरीब व कमजोर वर्ग को राहत प्रदान करने के लिए तमाम जन कल्याणकारी योजनाएं चलाई जाती रही हैं। इन मुफ्त की योजनाओं या सब्सिडी वाली योजनाओं का लाभ क्या उन लोगों तक पहुंच रहा है जो इसके हकदार हैं या असल पात्र हैं। अथवा इन योजनाओं का लाभ ऐसे लोग उठा रहे हैं जो अपात्र है इस मामले में बीते कल देश की सर्वाेच्च अदालत ने तमाम सवाल उठाते हुए सरकार की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा किया गया है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि सरकारों द्वारा सब्सिडी देते समय देश की 75 फीसदी आबादी को गरीबी की रेखा से नीचे बताया जाता है और विकास का दावा करते हुए प्रति व्यक्ति आय में लगातार बढ़ोतरी दिखाई जाती है और यह दर्शाया जाता है कि अब कोई गरीब नहीं है। कोर्ट का कहना है कि यह दोनों बातें सच कैसे हो सकती हैं। सरकार द्वारा खाघ सुरक्षा के तहत देश के 81 करोड लोगों को मुफ्त राशन दिया जा रहा है वहीं 11 करोड लोगों को सस्ती दरों पर राशन दिया जा रहा है जब सरकार द्वारा 92 करोड लोगों को मुफ्त या सब्सिडी वाला राशन दिया जा रहा है तो केवल क्या वही लोग राशन नहीं ले रहे हैं जो आयकर दाता है। अभी प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि उनकी सरकार के दूसरे कार्यकाल में 25 करोड लोगों को गरीबों की रेखा से ऊपर लाने का काम किया गया है। स्वाभाविक है देश में इससे पहले भी 20—30 या 40 करोड लोग तो गरीबों से ऊपर रहे ही होंगे। अगर देश की आधी आबादी गरीबी से ऊपर आ चुकी है तो यह 92 करोड लोग जो मुफ्त या सस्ता राशन ले रहे हैं कौन लोग हैं? अदालत ने इस बात पर हैरानी जताई है कि आखिर यह क्या खेल तमाशा है? कोर्ट द्वारा कहा गया है कि राशन कार्ड अब लोकप्रियता कार्ड बन चुका है। हमने कई बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने संबोधनों में यह कहते हुए सुना है कि कांग्रेस के राज में खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि गरीब कल्याण और विकास के लिए चलाई जाने वाली योजनाओं के लिए केंद्र से एक रूपया भेजा जाता है तो सिर्फ 10 पैसे ही लाभार्थियों तक पहुंचते हैं। लेकिन अब ऐसा नहीं हो सकता है अब अगर एक रूपया भेजा जाता है तो पूरा एक रूपया ही पात्र व्यक्ति के हाथों तक पहुंचता है। लेकिन मोदी का यह दावा सच नहीं है। बात चाहे मनरेगा की हो या फिर मुफ्त राशन की अथवा अन्य किसी योजना की। सभी जन कल्याणकारी योजनाओं का लाभ आज भी अपात्र लोग ही ज्यादा उठा रहे हैं। यही नहीं आज भी इन योजनाओं में इतने बिचौलिए घुसे हुए हैं कि वह जरूरतमंदों तक किसी योजना का लाभ पहुंचने नहीं देते हैं। पहले रुपए में 10 पैसे का लाभ उन तक पहुंचता था तो अब रुपए में चवन्नी भर का लाभ पहुंच रहा है। मनरेगा में भर्ती मजदूरों की सूची और हस्ताक्षर लेकर उनकी मजदूरी का पैसा ठेकेदार हड़प रहे हैं तो मुफ्त का राशन भी गरीब व मजदूरों से ज्यादा गाड़ी और कोठियां में रहने वाले ही ले रहे हैं यह बात अलग है कि इस राशन को वह खुद खाते नहीं है अन्य तरीकों से ठिकाने लगा रहे हैं। बीते 5 दशकों से गरीबों के लिए चलने वाली योजनाओं का लाभ अगर गरीबों को मिला होता तो शायद आज देश में कोई भी गरीब नहीं होता और न सरकार को मुफ्त राशन बांटने की जरूरत पड़ रही होती।

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