October 8, 2026आतंकवाद की सबसे बड़ी ताकत उसका हथियार नहीं, बल्कि उसकी बदलती हुई रणनीति है। सुरक्षा एजेंसियां जिस खतरे को पहचानकर उससे निपटने की तैयारी करती हैं, आतंकवादी नेटवर्क उससे आगे निकलने के रास्ते तलाशने लगते हैं। भारत में इजरायल के राजदूत रूवेन अजार की ताजा चेतावनी इसी बदलती चुनौती की ओर ध्यान खींचती है। उनका कहना है कि आतंकवादी संगठन सरकारों और सुरक्षा एजेंसियों की तुलना में तेजी से अपनी क्षमताएं बढ़ा रहे हैं और दुनिया को कट्टरपंथी इस्लामी आतंकवाद की एक नई लहर के लिए तैयार रहना चाहिए। यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब फ्लाईदुबई के तेल अवीव जा रहे विमान में काकपिट के भीतर हुई गंभीर घटना ने विमानन सुरक्षा और आतंकवादी खतरे की नई आशंकाओं को सामने ला दिया। भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छार और यात्रियों की तत्परता से एक बड़ी त्रासदी टली। इजरायली अधिकारियों ने घटना के दौरान अपने सुरक्षा तंत्र को सक्रिय किया और लड़ाकू विमानों को भी तैयार किया था। घटना की पूरी जांच अभी जारी है, इसलिए इसके पीछे की अंतिम मंशा को लेकर निष्कर्ष निकालने में सावधानी जरूरी है। लेकिन इस घटना से बड़ा सवाल सामने आता है। क्या आतंकवाद अब केवल सीमा पार बैठे संगठनों का खतरा रह गया है? या फिर उसकी नई रणनीति ऐसी है जिसमें विचारधारा, तकनीक, व्यक्तिगत कट्टरपंथ, अंतरराष्ट्रीय संपर्क और छोटे-छोटे माड्यूल एक-दूसरे से जुड़कर बड़ा खतरा पैदा कर सकते हैं? अजार ने भारत के पड़ोस में हमास के प्रभाव का उल्लेख करते हुए दावा किया है कि संगठन की गतिविधियां पश्चिम एशिया से आगे भी दिखाई दे रही हैं और उसने क्षेत्र के कुछ आतंकी संगठनों को प्रभावित किया है। उन्होंने 2025 के पहलगाम हमले को भी इसी प्रभाव की एक अभिव्यक्ति बताया। इन दावों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए, लेकिन भारत की सुरक्षा नीति केवल किसी एक देश के आकलन पर नहीं, बल्कि भारतीय खुफिया सूचनाओं, जांच और स्वतंत्र सुरक्षा मूल्यांकन पर आधारित होनी चाहिए। यही वह बिंदु है जहां भारत के सामने वास्तविक चुनौती खड़ी होती है। आतंकवाद का मुकाबला केवल सीमा पर सैनिक तैनात करके नहीं किया जा सकता। इसके लिए खुफिया सूचनाओं का वास्तविक समय में आदान-प्रदान, राज्यों और केंद्र के बीच बेहतर समन्वय, विमानन एवं महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की सुरक्षा, साइबर निगरानी, कट्टरपंथी नेटवर्क की पहचान और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के साथ सहयोग इन सभी मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा। भारत और इजरायल के बीच आतंकवाद विरोधी सहयोग पहले से ही महत्वपूर्ण है। लेकिन सहयोग का अर्थ किसी दूसरे देश की हर सुरक्षा व्याख्या को स्वीकार करना नहीं हो सकता। भारत की अपनी परिस्थितियां, सामाजिक संरचना और सुरक्षा प्राथमिकताएं हैं। इसलिए जरूरी है कि हर चेतावनी को तथ्यों की कसौटी पर परखा जाए और फिर उसके आधार पर सुरक्षा रणनीति को मजबूत किया जाए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को किसी धर्म के खिलाफ लड़ाई में बदलने से बचना होगा। आतंकवाद का विरोध आतंकवादी विचारधारा और हिंसा के खिलाफ होना चाहिए, किसी समुदाय के खिलाफ नहीं। कट्टरपंथ का मुकाबला कानून, खुफिया क्षमता, शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती से ही किया जा सकता है। फ्लाईदुबई की घटना ने एक और सबक दिया हैकृकभी-कभी बड़ी सुरक्षा चुनौती किसी युद्धक्षेत्र से नहीं, बल्कि सामान्य दिखने वाली व्यवस्था के भीतर से पैदा हो सकती है। यही कारण है कि सुरक्षा तंत्र को केवल पारंपरिक खतरे नहीं, बल्कि अप्रत्याशित परिस्थितियों के लिए भी तैयार रहना होगा। इजरायली राजदूत का संदेश इसलिए महत्वपूर्ण है कि वह हमें भयभीत करने के बजाय तैयारी का प्रश्न सामने रखता है। आतंकवादी यदि तेजी से अपनी रणनीति बदल रहे हैं तो सुरक्षा एजेंसियों को उससे तेज सीखना होगा। लोकतंत्र की सुरक्षा केवल हथियारों से नहीं होती। सतर्क संस्थाएं, विश्वसनीय खुफिया तंत्र, तकनीकी क्षमता और नागरिकों की जागरूकता भी उसकी पहली रक्षा-पंक्ति हैं।