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पंचायत चुनाव में युवाओं का दबदबा

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  • छोटी सरकार के गठन को मतगणना जारी
  • महिलाओं की ग्राम विकास में बढ़ी भागीदारी
  • दर्जनों सीटों पर कांटे का मुकाबला देखा गया

देहरादून। उत्तराखंड में छोटी सरकार के गठन के लिए हुए चुनाव के परिणाम अब सामने आने शुरू हो गए हैं। आज सुबह 10 जिलों के 89 विकास खण्डो में बने मतगणना स्थलों पर मतों की गिनती का काम शुरू हुआ। दोपहर 3 बजे तक बड़ी संख्या में ग्राम प्रधान पदों के नतीजे आ चुके थे तथा कुछ क्षेत्र पंचायत व जिला पंचायतो के नतीजे भी आ चुके थे लेकिन मतगणना का काम देर रात तक पूरा हो सकेगा। क्योंकि छोटी सरकार के लिए होने वाले इस चुनाव में वैलिड पेपर पर चुनाव होता है जिसकी गणना में ईवीएम की तुलना में अधिक समय लगता है।
अब तक मिले चुनावी नतीजों में जो कुछ खास देखा गया है वह इस बार जनता का युवा चेहरों पर अधिक भरोसा जताया जाना और मातृशक्ति को अधिक प्राथमिकता दिया जाना है। अब तक मिले परिणामों में 646 ग्राम प्रधान और 91 क्षेत्र पंचायत तथा 6 जिला पंचायत सदस्यों के परिणाम घोषित किये जा चुके हैं। घोषित विजय प्रत्याशियों में अधिकांश युवा और महिलाएं हैं। चमोली की एक सीट पर प्रधान पद पर 23 वर्षीय नितिन को विजय मिली है। मुकाबले में उनके प्रतिद्वंदी प्रत्याशी रविंद्र को भी उनके बराबर ही 139 वोट मिले थे लेकिन लॉटरी से हुए फैसले में नितिन ने बाजी मार ली। उधर ऐसा ही एक कांटे का मुकाबला चमोली के नारायण बगड़ ब्लॉक की पंचायत कोट में प्रधान पद पर देखने को मिला जिसमें रजनी देवी ने 73 वोट हासिल कर अपने प्रतिद्वंदी कुलदीप सिंह को मात्र एक वोट से हरा दिया कुलदीप को 72 वोट मिले थे।
12 जिलों के 89 विकास खण्डो के लिए कुल 3258 (पदों) सीटों के लिए हुए इस चुनाव में 17564 ग्राम प्रधान प्रत्याशी, 1587 जिला पंचायत सदस्य प्रत्याशी, 4235 ग्राम पंचायत सदस्य प्रत्याशी और 9194 क्षेत्र पंचायत सदस्य प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे। जिनके चुनाव के लिए दो चरणों में 24 व 28 जुलाई को मतदान हुआ था। आज मतगणना के लिए सभी 89 विकास खण्डों में सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए गए थे तथा 9 हजार सुरक्षाकर्र्मी व 15 हजार मतगणना कर्र्मीलगाए गए हैं सभी जिलों के अधिकारी मतगणना स्थलों पर चौकसी कर रहे हैं। प्रत्याशियों का हर मतगणना स्थल पर जमावड़ा है। जिस भी प्रत्याशी का परिणाम घोषित हो जाता है वह अपने समर्थकों के साथ बाहर आ जाता है। विजय प्रत्याशी फूल मालाओं से लदा होता है जबकि हारे हुए प्रत्याशी निराश लौटते दिखते हैं।
पंचायत चुनाव किसी पार्टी के सिंबल पर नहीं लड़े जाते तथा राजनीतिक दलों के समर्थित प्रत्याशी ही होते हैं। इसलिए पूरा चुनाव परिणाम आने पर यह पता चल पाता है कि किसी राजनीतिक दल का पलड़ा भारी रहा।

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