संभावी नतीजों से सहमें नेता

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मतगणना की तारीख जैसे—जैसे करीब आ रही है नेताओं की बेचैनी भी बढ़ती जा रही है। विधानसभा का वर्तमान चुनाव जिन विसंगतियों के बीच संपन्न हुआ है उसके मद्देनजर इस बार चुनावी नतीजे भी चौंकानेवाले आ सकते हैं। भले ही भाजपा और कांग्रेस के नेताओं द्वारा मतदान के बाद से ही अपनी—अपनी जीत के बड़े—बड़े दावे किए जा रहे हैं किंतु चुनाव परिणामों को लेकर आशंकाओं ने सभी को घेर रखा है। अगर—मगर में उलझे इन नेताओं में से किसी को भी अपनी जीत का पक्का भरोसा नहीं है। पूर्व सीएम हरीश रावत और सीएम धामी जैसे नेता कुछ ज्यादा ही चिंतित और परेशान हैं। हरीश रावत क्योंकि इस चुनाव को अपनी अंतिम राजनीतिक पाली के रूप में देख रहे हैं, इसे अपनी हार के साथ समाप्त नहीं करना चाहते हैं। इसलिए उनका सब कुछ दांव पर लगा हुआ है। वहीं सीएम धामी लगातार दो बार सीएम बनने का नया इतिहास रचने का सपना संजोय बैठे हैं और उनकी यह महत्वकांक्षाएं तीसरे आसमान पर हैं। इसलिए वह भी इन दिनों दिल्ली में सभी वरिष्ठ नेताओं के घरों के चक्कर काट रहे हैं तथा मंदिर—मंदिर मन्नते मांग रहे हैं। आम आदमी पार्टी की चुनावी आमद और बसपा की पुनः सक्रियता के कारण भाजपा और कांग्रेस के मत प्रतिशत का प्रभावित होना लाजमी है। चुनाव मेंं आप और बसपा को कितनी सीटें मिलती है यह महत्वपूर्ण बात नहीं है बल्कि उनके प्रत्याशी कितने वोट हासिल करते हैं और उससे भाजपा व कांग्रेस को कितना—कितना नुकसान होता है यह ज्यादा महत्वपूर्ण है। आप और बसपा के प्रत्याशियों को जो वोट मिलेंगे वह भाजपा और कांग्रेस के कई प्रत्याशियों की जीत को हार में और हार को जीत में बदलने का काम कर सकते हैं। राज्य में दर्जन भर के आस—पास ऐसी सीटें होती है जहां 2000 से भी कम वोटों के अंतर से हार जीत का फैसला होता है। ऐसी तमाम सीटों पर भाजपा व कांग्रेस का गणित गड़बड़ा सकता है। मतदान के बाद भितरघात की खबरों से गिरी भाजपा को भितरघात से भी नुकसान की संभावनाओं को नकारा नहीं जा सकता है। इन्हीं तमाम कारणों को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों के नेता आशंकित है। यही कारण है कि इन नेताओं द्वारा मतगणना से पूर्व ही इन संभावनाओं पर भी काम शुरू कर दिया है कि अगर उन्हें सरकार बनाने के लिए जरूरी 36 सीटें नहीं मिल सकी तो उन्हें सत्ता में आने के लिए कहां से सपोर्ट मिल सकता है। 2012 के चुनाव में भाजपा को 31 और कांग्रेस को 32 सीटें मिली थी वैसे ही हालात 2022 में भी पैदा हो सकते हैं और अगर आप तथा बसपा 2—2, 4—4 सीटें जीत पाई तो यह अंकगणित और जटिल हो सकता है। खैर होगा क्या इसका पता तो 10 मार्च को ही चलेगा लेकिन इस बार चुनाव में परिणाम भाजपा या कांग्रेस के मनोकूल रहने की संभावनाएं अत्यंत ही कम नजर आ रही है। जो भाजपा कांग्रेस के नेताओं की उलझनों का कारण बनी हुई हैं। मतगणना के बाद अपने विधायकों को खरीद फरोख्त कर तोड़ने की कोशिशों से बचाने पर दलों ने काम शुरू कर दिया है यह संभावित नतीजों का ही भय है जिससे नेता सहमे हुए हैं।

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