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राजनैतिक दलों का मिशन ‘कुनबा’

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  • प्रदेश में 2027 में होने हैं विधानसभा के चुनाव
  • भाजपा-कांग्रेस में कुनबा बढ़ाने की जंग है जारी
  • दलों में इस राजनीति से कई बार उपजा असंतोष

देहरादून। चुनावी साल में राजनैतिक दल अपनी रणनीति के साथ अपने ‘कुनबे’ को बढ़ाने में लग गए है। प्रमुख दल भाजपा और कांग्रेस में ‘कुनबा’ बढ़ाने को लेकर कई बार अंतरकलह का भी सामना करना पड़ता है। अकेले प्रदेश में विगत दिनों कांग्रेस में उपजे असंतोष भी कुनबा बढ़ाने की लड़ाई का ही परिणाम था। यही नहीं भाजपा में भी इसको लेकर ‘द्वंद’ सामने आया था। इसके बाद भी प्रमुख दलों की रणनीति दूसरे दलों के लोगों को अपने दल में शामिल करने की जारी है।
बता दें कि प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं और चुनाव की घोषणा से पहले भाजपा और कांग्रेस सहित अन्य दल अपनी पार्टी को बड़ा करने की दिशा में कार्य कर रहे है। मतदाताओं को अपने पक्ष में माहौल है को प्रदर्शित करने के लिए दल इस रणनीति पर कार्य कर रहे हैं। हालांकि इससे दलों में बिखराव और अंतरकलह के साथ कई अन्य परेशानियों से जूझना पड़ता है। इसके बाद भी सभी दल चुनाव से पूर्व अपने पक्ष में माहौल बनाना चाहते हैं। दलों की यह राजनीति चुनाव के समय उनके काम आयेगी या नहीं यह तो चुनाव के समय ही पता चलेगा, लेकिन दल अभी से इसी बहाने माहौल तैयार कर रहे हैं।
अकेले भाजपा की बात करें तो भाजपा में सब ठीक है यह तो संभव नहीं है, लेकिन भाजपा अपने कुनबे को बढ़ाने में लगी है। वर्तमान में प्रदेश में भाजपा की सरकार है और भाजपा से जुड़ने वालों की लाइन लंबी है। खासकर सूबे में प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के कार्यकर्ता भाजपा से जुड़ना चाहते है। यह हमारा नहीं भाजपा का है। भाजपा प्रदेश कार्यालय में प्रतिदिन ज्वांनिंग कार्यक्रम और भाजपा की विज्ञप्ति इस बात की पुष्टि करती है। भाजपा से जुडे़ने वालों को सरकार से उम्मीद है कि उनका भाजपा में आने से भला होगा। वही विधानसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा कुनबे को बड़ा करना चाहती है ताकी विधानसभा चुनाव के समय जमीन पर भाजपा के पक्ष में मतदान के लिए मतदाताओं को रिझा सके।
दूसरी ओर कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए सभी जुगत लगा रही है। कांग्रेस के रणनीतिकार जहां भाजपा के बडे़ नेताओं को दल में शामिल करवा रही है। वहीं सत्ता में वापसी की ‘चाहत’ में शायद ‘लालच’ देकर भाजपा के बडे़ नेताओं को दल में जगह दे रही है। इस बात की पुष्टि विगत दिनों कांग्रेस के बडे़ नेताओं में उपजे असंतोष ने कर दी है। कांग्रेस के एक बडे़े नेता अपने चहेते को दल में शामिल करवाना चाहते थे, लेकिन हाईकमान से इसकी छूट नहीं मिली तो वह तिलमिला गए और राजनैतिक अवकाश पर चले गए। कांग्रेस में यह घटनाक्रम कोई नया नहीं है। इससे पहले के भी कई उदाहरण हैं जब कांग्रेस में आपसी फूट पड़ी है।
वही प्रदेश के एकमात्र क्षेत्रिय दल यूकेडी की सक्रियता और गांव-गांव सदस्यता अभियान से भाजपा और कांग्रेस में खलबली मची हुई है। क्योंकि इस बार यूकेडी का नेतृत्व युवा कर रहे हैं और सभी को हालिया राजनैतिक घटनाक्रम जो पड़ोसी देश नेपाल में घटा उससे भाजपा और कांग्रेस का असहज होना लाजमी है। इसके साथ ही विधानसभा चुनाव को देखते हुए अन्य दल भी खुद की उपस्थिति दर्ज करवाने में लगे है। अब विधानसभा चुनाव में यह दिलचस्प होगा कि जनता किसके सिर ताज पहनाती है।

पूर्व सैनिकों ने ज्वाइन की भाजपा
सीमांत क्षेत्र से संख्या में आए पूर्व सैनिकों ने भाजपा सदस्यता ग्रहण की है। भाजपा मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम में प्रदेश महामंत्री तरुण बंसल और दीप्ति रावत ने धारचूला विधानसभा से आए सभी पूर्व सैनिकों को पटका पहनाकर पार्टी में स्वागत किया। भाजपा में शामिल होने वाले धारचूला से आए पूर्व सैनिकों में कैप्टन भूपाल सिंह रावल, अध्यक्ष गौरव सेनानी संगठन, सूबे मेजर, दीवान सिरवाल, सूवेदार पुष्कर वम, सूबेदार धन सिंह, नायब सूबेदार नारायण सिंह आदि शामिल थे।

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