नीती घाटी के लोग जान हथेली पर रखकर कर रहे आवाजाही

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चमोली। नीती घाटी में भारत—तिब्बत सीमा से सटे गांवों में रहने वाले लोगों की मुसीबतें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। इन स्थानीय लोगों के लिए मलारी—जोशीमठ नेशनल हाइवे पर आवाजाही करना अपनी ही मौत को निमंत्रण देने जैसा है।
जोशीमठ—मलारी नेशनल हाईवे पर सुराइथोटा से आगे तमक के पास पहाड़ी से पत्थर गिरते रहते हैं। जहां घाटी के लोग किसी प्रकार आवाजाही बनाये हुए थे, किन्तु गत 12 अगस्त को एकाएक हए बोल्डरों की बरसात से सड़क पूरी तरह बन्द हो गई। भारी मात्रा में पहाड़ी से लुढ़के पत्थरों से फोन लाइन व विघुत पोल ढह गए जिसके चलते जुम्मा, जेलम, कोसा, मलारी, कैलाशपुर, महरगाव, द्रोणागिरी, कागा, गरपक, रवींग, फरगाव, बम्पा, गमसाली व नीती सहित 16 गांवों का देश— दुनिया से सम्पर्क कट गया।
दैनिक सामान की पूर्ति के लिए भी यह लोग जान हथेली पर रख कर सफर करते हैं। अभी तक वैसे तो किसी भी जनहानि की सूचना नहीं है लेकिन 2 दर्जन से अधिक बकरियां मर चुकी हैं जबकि कुछ मजदूर व सैनिक भी घायल हुए हैं। अब ग्रामीणों की चिंता बढ़ गई है कि अक्टूबर माह में शीतकालीन प्रवास क्षेत्र को बच्चों, बुजुर्गों, महिलाओं सहित मवेशी और सामान के साथ यहां से सुरक्षित कैसे निकल पाएंगे।
मामले में चमोली प्रशासन सहित बीआरओ लम्बे समय तक मौन साधे रहा। जोशीमठ में सामाजिक कार्यकर्ताओं व विपक्षी दलों के नेताओं ने घाटी में ब्यवस्था सुचारू किये जाने को लेकर आवाज उठाई, जिस पर स्थानीय प्रशासन की नींद खुली व आनन—फानन में हैली सेवा सुरु कर दी गई, लेकिन घाटी के गांवों में सूचना नहीं पहुँचने से हवाई सेवा क्षेत्रीय जनों को खास लाभ पहुचा पाने में नाकाम रही।
उल्लेखनीय है कि अक्टूबर माह में शीतकालीन प्रवास के लिए घाटी से लोग चमोली जनपद के विभिन्न हिस्सों में उतर आते हैं जहां 6 माह प्रवास कर पुनः भोट क्षेत्र को लौट आते हैं, किन्तु बच्चों, बुजुर्गों व माल के साथ मवेशियों को साथ लेकर घाटी से सकुशल निकल आने की चिंता ग्रामीणों को साल रही है।

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