रामपुर तिराहा कांडः 28 सालों में भी नहीं मिला न्याय?

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राज्य गठन के बाद सरकारों के रवैए से आहत हैं आंदोलनकारी

देहरादून। जब—जब 2 अक्टूबर (गांधी जयंती) का दिन आता है तब तब उत्तराखंड के लोग रामपुर तिराहा कांड की दुखद यादों से सिहर उठते हैं। क्योंकि यही वह दिन था जो उत्तराखंड आंदोलन के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज है। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद आज तक जितनी भी सरकारे बनी है और मुख्यमंत्री बने हैं वह रामपुर तिराहे पर बने शहीद स्थल पर जाकर उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित कर अपने कर्तव्य की इतिश्री करते रहे हैं वहीं राज्य आंदोलनकारी शहीदों को ट्टहम शर्मिंदा हैं तुम्हारे कातिल जिंदा हैं’ जैसे नारे लगाते रहे हैं लेकिन इससे आगे वह 28 सालों में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सके हैं।
वह 2 अक्टूबर 1994 को जब अलग पर्वतीय राज्य की अपनी आवाज को दिल्ली तक पहुंचाने के लिए आंदोलनकारी दिल्ली कूच की तैयारी कर रहे थे। 40 बसों में सवार होकर जब यह सैकड़ों आंदोलनकारी शाम को दिल्ली रवाना हुए तो उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि 4 घंटे बाद उन्हें किसी बड़ी मुसीबत का सामना करना पड़ेगा। बाड़ी मंडवा खाएंगे उत्तराखंड बनाएंगे का नारा लगाते हुए इन आंदोलनकारियों का कारवां जब नारसन चौराहे पर पहुंचा तो पुलिस ने उन्हें रोक दिया लेकिन कुछ देर की जद्दोजहद के बाद काफिला आगे बढ़ गया। और जैसे ही आंदोलनकारियों का यह काफिला रामपुर तिराहे पर पहुंचा तो उत्तर प्रदेश पुलिस ने उसे रोक दिया। जहां आंदोलनकारियों की भिड़ंत पुलिस से शुरू हो गई तत्कालीन डीएम अनंत कुमार यहां हुए पथराव में घायल हो गए। इस घटना से आक्रोशित पुलिस ने न सिर्फ जमकर लाठीचार्ज किया बल्कि बर्बरता की सारी हदें पार कर दी। लेकिन आंदोलनकारी रुकने को तैयार नहीं थे। ढाई सौ आंदोलनकारी हिरासत में ले लिए गए। देर रात 3 बजे फिर आंदोलनकारी आगे बढ़े तो फिर संघर्ष शुरू हो गया। पुलिस ने इस दौरान 24 राउंड फायरिंग की जिसमें 7 आंदोलनकारियों की जान चली गई और डेढ़ दर्जन से अधिक घायल हो गए।
हालात इतने खराब हो गए कि पुलिसकर्मियों द्वारा महिला आंदोलनकारियों को भी नहीं बख्शा गया पुलिस पर छेड़छाड़ और सामूहिक रेप के भी आरोप थे जिसको लेकर कई सालों तक मुकदमा चला। आंदोलनकारियों ने स्थानीय लोगों के यहां शरण ली। इस घटना की सूचना जैसे ही देहरादून पहुंची पूरा पहाड़ गुस्से और आक्रोश की आग में झुलस उठा। इस घटना से आंदोलन की ऐसी चिंगारी भड़की की जो 9 नवंबर 2000 में अलग राज्य गठन के बाद ही शांत हो सकी। 6 साल के उग्र आंदोलन के बाद पहाड़ के लोगों को अलग राज्य तो मिल गया लेकिन यह दुर्भाग्य की बात ही है कि राज्य वासी अब अपनी ही सरकारों के खिलाफ अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं। 1995 में इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा इस मामले को सीबीआई को सौंपें जाने से लेकर 2003 में नैनीताल हाई कोर्ट द्वारा इस केस में जिलाधिकारी को आरोपी बनाने एक पुलिसकर्मी को 7 साल तथा दो को दो—दो साल की सजा सुनाए जाने के बाद से आज तक इस घटना के सभी दोषियों को सजा और आंदोलनकारियों को न्याय अभी तक नहीं मिल सका है।

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