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सर्वाेच्चता की जंग चिंताजनक

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यूं तो इस देश की राजनीति में बीते एक दशक में बहुत कुछ ऐसा हुआ है जो पहले कभी नहीं हुआ लेकिन वर्तमान समय में न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच सर्वाेच्चता की जंग में देश की राष्ट्रपति को भी शामिल किए जाने की घटना न सिर्फ हैरान करने वाली है बल्कि इस जंग को ऐसे निर्णायक पड़ाव पर लेकर आ गई है कि देश के नवनियुक्त सीजेआई वीआर गवई इस पर क्या करते हैं? इस पर पूरे देश की नजरें लगी हुई है। इस विवाद की शुरुआत बीते माह आए अदालत के उस फैसले से हुई थी जिसमें राज्यपालों द्वारा सरकार के पारित विधेयक को अनिश्चितकाल तक लंबित रखे जाने की समस्या से परेशान तमिलनाडु सरकार द्वारा अदालत का दरवाजा खटखटाया गया था। राज्यपालों द्वारा पारित विधेयकों को सालों तक लटकाए रखना उन पर हस्ताक्षर न करना और न ही पुनर्विचार के लिए वापस भेजना और इससे भी आगे जाकर उन्हें राष्ट्रपति के पास भेज दिया जाना जहां सालों तक कोई फैसला न लिया जाना भले ही यह सब संवैधानिक अधिकारों के तहत ही क्यों न किया गया हो लेकिन किसी भी राज्य के राज्यपाल द्वारा किया जाता है तो ऐसी स्थिति में क्या सरकार को काम करने से रोका जाना नहीं है न्यायालय ने इसे असंवैधानिक मानते हुए फैसला दिया कि राज्यपाल को किसी भी विधेयक प्रस्ताव पर 3 महीने के अंदर फैसला लेना अनिवार्य होगा। कोर्ट ने राज्यपालाें द्वारा बिना हस्ताक्षर राष्ट्रपति को भेजे जाने वाले प्रस्तावों के बारे में भी व्यवस्था दी गई थी कि राष्ट्रपति को भी इस पर 3 महीने में अपनी राय देनी चाहिए। सच यह है कि जिन राज्यों में गैर भाजपा सरकारे हैं उन्हें काम न करने देने और उनके काम में अंड़गा डालकर उन्हें नकारा साबित करने की यह कोशिशे सिर्फ डबल इंजन सरकारों की अवधारणा को मजबूत बनाने के लिए ही की जा रही थी। केंद्र में अगर भाजपा की सरकार है तो राज्यों में भी भाजपा की सरकार बने यह सुनिश्चित करने की कोशिश है। अगर आप किसी अन्य दल की सरकार चुनेंगे तो वह काम नहीं करेगी या उसे काम नहीं करने दिया जाएगा। क्या यह अवधारणा किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित ठहराई जा सकती है लेकिन कोर्ट के इस फैसले को केंद्र सरकार और भाजपा के नेता पचा नहीं पाए और क्या न्यायपालिका को कार्यपालिका के फैसलों में दखल देने तथा राज्यपालों और राष्ट्रपति को निर्देशित करने का अधिकार है जैसे अनेक सवाल खड़े कर दिए गए। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने तो यहां तक कह डाला कि कार्यपालिका ही सर्वाेच्च है। न्यायपालिका को उसके काम में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है इसमें कोई दो राय नहीं है कि देश का संविधान ही सर्वाेच्च है। कार्यपालिका या न्यायपालिका को संविधान के दायरे में रहकर ही काम करने का अधिकार है। कार्यपालिका भी अगर संविधान के अनुकूल काम नहीं करती है तो न्यायपालिका उसके असंवैधानिक कार्यों को रोकने की ताकत या शक्तियां रखती है और उसने सरकार के कई फसलों को असंवैधानिक करार देते हुए उन्हें निरस्त भी किया है जिसका उदाहरण इलेक्टोरल बांड भी है। तब सरकार द्वारा इस पर सवाल क्यों नहीं उठाए गए। राष्ट्रपति मुर्मू ने अब जो 14 सवालों के जवाब नए मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गवई से मांगे गए वह पत्र उनके शपथ ग्रहण व पदभार ग्रहण से पहले ही तैयार कर लिए गए थे। देश में बीते कुछ समय से अगर संविधान बदलने की बात चर्चाओं के केंद्र में है तो वह बेवजह नहीं है। इस विवाद में राष्ट्रपति जो देश के सर्वाेच्च संवैधानिक पद पर आसीन है सरकार अगर उन्हें चुनने का अधिकार रखती है तो इसका मतलब यह नहीं होता कि कोई भी सत्ताधारी दल उन्हें अपनी नीतियों के अनुरूप कार्य करने के लिए दबाव बनाये। नए चीफ जस्टिस वीआर गवई अब इन सवालों का जवाब क्या देते हैं और जिस वक्फ बिल को लेकर कोर्ट में चल रही सुनवाई पर क्या फैसला करते हैं यह आने वाला समय ही बताएगा लेकिन एक बात साफ है कि यह उनकी किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं है। संविधान और लोकतंत्र को बचाए रखने की यह जंग जिस खतरनाक स्तर पर पहुंच चुकी है वह अत्यंत ही गंभीर और चिंतनीय है।

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