आजादी के अमृत काल में आज अगर देश में अलगाववाद की जो आग सुलग रही है वह स्थिति कोई एक दिन में पैदा नहीं हुई है। वक्फ संशोधन बिल 2025 के संसद के पारित होने के बाद लगभग एक दर्जन राज्यों में प्रदर्शनों का होना इसकी एक बानगी भर है। देश की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति पर गौर करने के लिए आजादी मिलने से लेकर अब तक के इतिहास पर नजर डालना बहुत जरूरी है। बंटवारे के बाद जब भारतीय संविधान की रचना की जा रही थी तब सब कुछ इतना अच्छा था और देश के किसी भी नेता के मन में कोई स्वार्थ की भावना नहीं थी। समाज के आम आदमी से लेकर महात्मा गांधी पंडित नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल तथा डा. भीमराव अंबेडकर तक सभी के दिलों दिमाग में सिर्फ हिंदुस्तान था इसके सिवाय और कुछ भी नहीं था। धर्म, आस्था व जातिवाद तथा क्षेत्र जैसी बातें मुद्दे नहीं थे। सभी लोग इमानदारी से राष्ट्र और समाज के बेहतरीन होने के लिए काम करना चाहते थे अगर ऐसा नहीं होता तो देश के अल्पसंख्यक व दलित—पिछड़े तथा कमजोर तबके के लोगों द्वारा अपने संरक्षण और रियायतों को न लिए जाने की पैरोकारी न की गई होती और न संविधान निर्माता ने उन्हें बराबरी तक लाने के लिए संविधान में उन्हें रियायते देने में कंजूसी बरती गई होती। आज वर्तमान दौर में जब समाज का हर एक तबका मुफ्त की सुविधाओं और आरक्षण तथा रियायतों के लिए सिर फुटव्वल कर रहा है तो उसके पीछे हमारे स्वार्थी नेताओं की वह राजनीति ही इसका प्रमुख कारण है जो वोट के लिए तमाम संवैधानिक वर्जनाओं और न्यायिक व्यवस्थाओं को तोड़ते आए हैं। बाबा अंबेडकर ने तो संविधान में सिर्फ 10 साल तक आरक्षण व रियायतों की व्यवस्था की थी फिर आज तक भी यह व्यवस्था क्यों जारी है? क्यों आरक्षण को लेकर देश को बड़े जाट आंदोलनों को झेलना पड़ा? आज क्यों संपन्न वर्ग के लोगों को भी मुफ्त की रियायतें और ओबीसी में आरक्षण चाहिए? इसके पीछे सिर्फ और सिर्फ वोट की राजनीति नहीं है तो और क्या है। अभी बीते दिनों संसद और विधानसभाओं में बैठे अपराधी नेताओ की लिस्ट चर्चाओं में रही। अगर 50 से 56 फीसदी अपराधिक प्रवृत्ति के लोग चुनाव लड़कर और जीतकर संसद और विधानसभा में बैठे हैं तो क्या यह न्यायपालिका की असफलता नहीं है। सरकारों द्वारा आज अगर असंवैधानिक कानून बनाये जा रहे हैं तो इसकी छूट इस देश के संविधान में उन्हें दी है? सच यह है की संविधान ने जो दिया था वह तो सब कुछ अच्छा ही था लेकिन देश के भ्रष्ट और बेईमान नेताओं तथा अधिकारियों ने ही सब कुछ खराब कर दिया है। संविधान जब बनाया गया था तब उसमें सबके साथ न्यायायिक समानता और पारदर्शिता सब कुछ था लेकिन वर्तमान दौर मे राष्ट्रभक्ति और समाज सेवा के नाम पर सिर्फ खेला हो रहा है। जिसने देश और देश के समाज को ऐसी समस्याओं की भटृी में झोंक दिया है जहां जाति—धर्म और क्षेत्रवाद के सिवाय कुछ नहीं बचा है मणिपुर इसका ज्वलंत उदाहरण है। अलगाववाद की आग किस—किस का घर जलायेगी? चिंता इस बात की नहीं है। चिंता इस बात की है कि इस आग से देश को कैसे बचाया जा सकता है और देश के रहनुमा आने वाली पीढियाें को कैसा देश देकर जाना चाहते हैं।




