भूस्खलन और हिमस्खलन ऐसी प्राकृतिक आपदाएं हैं जिनके बारे में कोई पूर्वानुमान या भविष्यवाणी किया जाना संभव नहीं है। अभी दो दिन पूर्व चमोली के माणा में हुई हिमस्खलन की घटना ने आठ लोगों की जिंदगी लील ली। गनीमत इस बात की है कि इस हिम स्खलन की चपेट में आए 54 में से 46 मजदूरों को युद्ध स्तर पर चलाएं गए रेस्क्यू अभियान की कामयाब कोशिशों से बचा लिया गया। इसके लिए राज्य तथा केंद्र सरकार द्वारा किए गए सामूहिक प्रयासों की सराहना की जानी चाहिए। एक अच्छी बात यह भी रही कि यह हादसा सुबह 7 बजे के आसपास हुआ जिस समय कुछ लोग जागे हुए थे अगर यह घटना देर शाम और रात में हुई होती तो इस घटना की सूचना मिलने तथा रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू होने में 10 से 12 घंटे तक अधिक समय लगता क्योंकि रात में रेस्क्यू का काम नहीं किया जा सकता था। क्योंकि किसी भी बचाव व राहत के काम में सबसे प्रभावी फैक्टर रिस्पांस टाइम का ही होता है। बीते साल चमोली के जोशीमठ में हुई भूधसाव कि जिस घटना से इस ऐतिहासिक शहर के अस्तित्व पर ही खतरा मंडरा रहा है यह दोनों घटनाएं ऐसी घटनाएं हैं जिनकी कोई पूर्व जानकारी संभव नहीं थी। लेकिन इसके साथ ही उन तथ्यों को भी नकारा नहीं जा सकता है जो मानवीय लापरवाही के कारण बड़ी दुर्घटनाओं के रूप में सामने आती हैं। हिमालयी राज्यों में होने वाले भौगोलिक परिवर्तनों पर बारीकी से नजर बनाए रखकर इस तरह के हादसोंं में होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है। पहाड़ों के ढलानों पर होने वाली बर्फबारी तथा बनने वाली कृत्रिम झीलो पर समय रहते ध्यान देने की जरूरत है। 2013 में केदारनाथ में भीषण आपदा का कारण पहाड़ों के ऊपर बनी झीले ही था जिसके नीचे आने पर अत्यंत रौद्र रूप धारण कर लिया था। माणा में आए एवलांच के बारे में जो बातें अब भुक्त भोगियों के माध्यम से सामने आ रही है वह यह बताती है कि बहुत पहले उन्हें किसी बड़ी अनहोनी की आशंका हो चुकी थी। कुछ लोगों का कहना यह भी है कि इस बड़े हिम स्खलन से पहले दो बार हिम स्खलन हुआ था। लेकिन इसे गंभीरता से नहीं लिया गया। कहीं भी अगर ग्लेशियर का एक छोटा हिस्सा अगर टूटता है तो वह इस बात का संकेत होता है कि उस क्षेत्र में कभी भी बड़े हिम स्खलन की संभावना है और माणा की घटना में भी वैसा ही कुछ हुआ था। पहाड़ों में जब अत्यधिक बर्फबारी हो रही होती है उस दौरान एक छोटा सा हिम स्खलन कब कितना विकराल रूप ले लेगा इसकी कोई कल्पना नहीं की जा सकती है। यह ठीक है कि सीमांत क्षेत्रों की सड़कों को सुचारू और सुदृढ़ बनाए रखने की जिम्मेदारी बीआरओ पर होती है और उन्हें खराब मौसम में अपना काम करना होता है क्योंकि यह मुद्दा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है लेकिन इसका मतलब यह भी कतई नहीं है कि बाकी सभी मुद्दों को नजर अंदाज कर काम करने वालों की जिंदगियों को दांव पर लगा दिया जाए। माणा जैसी घटनाओं को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए तथा भविष्य में सीमांत क्षेत्रों में काम करने वाले इन लोगों की और अधिक सुरक्षा कैसे निश्चित की जा सकती है इसके लिए ठोस नियम बनाए जाने की जरूरत है। हर एक साइड पर एक इमरजेंसी हेल्प यूनिट और आपदा प्रबंधन की टीम का तैनाती करके भी इस तरह के हादसों में होने वाले जान माल के नुकसान को कम किया जा सकता है। सीमांत क्षेत्रों में क्योंकि यह काम न कभी समाप्त हुआ है और न होने वाला है इसलिए स्थाई सुरक्षा व्यवस्था किया जाना आवश्यक है।




