राहुल गांधी द्वारा जारी किया गया अपना एक 9 मिनट 23 सेकंड का वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है, उसे देश के उन तमाम नेताओं को जरुर देखना और सुनना चाहिए जो उन्हें नॉन सीरियस नेता से लेकर मूर्ख बताते या समझते रहे हैं। देश की जनता को भी उनके इस देश की राजनीति में तहलका मचा देने वाले भाषण को सुनना चाहिए क्योंकि इसमें देश के वर्तमान राजनीतिक हालात पर उनके द्वारा न सिर्फ पूरी बेबाकी के साथ अपनी बात कही गई है बल्कि संवैधानिक सिस्टम को सत्ता द्वारा संपूर्ण समाप्त करने की बात कही गई है। उनका कहना है कि विपक्ष को किसी भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि वह लोकतांत्रिक तरीके से भाजपा को हराकर सत्ता से बाहर कर सकते हैं। अब देश में कोई भी चुनाव नहीं जीत सकता है क्योंकि चुनाव आयोग से लेकर अन्य सभी संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जा कर लिया गया है न्यायपालिका से लेकर ब्यूरोक्रेट्स तक और मीडिया तक सभी सत्ता के अनुकूल काम कर रहे हैं यहां तक कि अब सोशल मीडिया पर अपनी बात कहना मुश्किल हो गया है। विपक्ष को इस भ्रम से बाहर निकालने की जरूरत है कि देश में लोकतंत्र है सरकार है जो संविधान के अनुसार काम करने पर बाध्य है। विपक्ष को अस्तित्वहीन बनाने के लिए उन्हें तोड़ा—मरोेड़ा जा रहा है। विपक्ष का अस्तित्वहीन होने का मतलब है उस जनता के अस्तित्व का समाप्त होना जिसने आपको वोट देकर चुना है। राहुल गांधी का कहना है कि जब न्याय की आस समाप्त हो चुकी है और चुनावी निष्पक्षता शेष नहीं बची तो सिर्फ एकजुट होकर सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरने और असहयोग आंदोलन छेड़ने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता है। जिसे वह रेसिस्टेंस का नाम देते हैं और वह आपसी मतभेद तथा निजी स्वार्थ को त्याग कर एकजुट होने का आह्वान करते हैं उनका कहना है कि विपक्ष के नेताओं के आलोचनाओं के जहर को पीने के लिए वह तैयार हैं साथ ही वह अपने इस आंदोलन को सत्य अहिंसा व करुणा के मूल्यों के साथ संवैधानिक दायरे में रहकर आगे बढ़ाने की बात कहते हैं। उन्होंने शायद यह बात इसलिए भी कही है क्योंकि सत्ता में बैठे लोग उन पर जेन जे के जरिए देश में अराजकता फैलाने का आरोप लगा चुके हैं तथा पेपर लीक और बेरोजगारी जैसे जो मुद्दे कॉकरोच जनता पार्टी की प्राथमिकता में है वह उनके आंदोलन की भी प्राथमिकता है। कई लोग तो दोनों को साथ मिलकर इस लड़ाई को लड़ने का सुझाव दे चुके हैं। राहुल गांधी अब अपनी राजनीतिक लड़ाई की लकीर खींच चुके हैं। लड़ाई लंबी चलेगी यह भी कह चुके हैं। राष्ट्रीय हित व सामाजिक सरोकारों की इस लड़ाई में इंडिया गठबंधन के कितने दल और नेता साथ होंगे या नहीं होंगे इस बात से उनका कोई सरोकार नहीं है वह यह कह जरूर रहे हैं कि सभी साथ आए तो लड़ाई आसान होगी वरना वह अपने कांग्रेस के युवा कार्यकर्ताओं के साथ अकेले ही अंतिम सांस तक लड़ेंगे भले ही उनका सर काट दिया जाए। एनसीपी और टीएमसी तथा राजद जैसे दलों व शिवसेना को यह समझ आ चुका है कि उनका अब अकेले वजूद क्या बचा है। रामविलास पासवान की लोजपा और नीतीश की जदयू भी इसी कतार में है। 2027 में सपा को भी संभावित खतरे का आभास बंगाल के चुनावी नतीजो से हो चुका है। कांग्रेस न सिर्फ आर पार की लड़ाई का ऐलान कर चुकी है अपितु आज कोटा से अपना आंदोलन शुरू कर चुकी है। देश के सभी जाति व वर्ग के लोग जो भाजपा के कुशासन से मुक्ति चाहते हैं तथा देश के युवा और बेरोजगार जिनके सामने जीवन मरण के हालात हैं इस जंग में कौन—कौन किस हद तक उनके साथ आते हैं इसका पता उनकी चार जनसभाओं से हो जाएगा कि इस असहयोग आंदोलन से देश की राजनीति और सिस्टम बदलेगा या नहीं और यह आंदोलन जो राहुल ने शुरू किया है क्या बीजेपी को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा सकेगा?




