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आर्थिक मंदी की मार

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क्या भारतीय अर्थव्यवस्था आर्थिक मंदी की चपेट में आ चुकी है। बाजारों में पसरा सन्नाटा तो यही संकेत दे रहा है कि आम आदमी की जेब खाली हो चुकी है और उसकी जेब में कुछ खरीदने के लिए पैसे है ही नहीं। अभी कुछ दिन पहले एक समाचार आया था कि वाहनों की बिक्री में भारी गिरावट आई है खास तौर पर बड़ी कारों में जिनकी कीमत 15—20 लाख से ऊपर है। कार डीलरों ने कंपनियों से कारें तो मंगा ली लेकिन अब वह उन्हें छूट के ऑफर देने के बाद भी नहीं बेच पा रहे हैं। लाखों की संख्या में अब यह कारें उनके शोरूम में खड़ी है। त्यौहारी सीजन में उन्हें कुछ राहत मिलने की उम्मीद भी दिखाई नहीं दे रही है आपको यह तो जानकारी होगी ही सोने की कीमतें बीते दो—तीन साल में कहां से कहां पहुंच गई हैं। 90 फीसदी की वृद्धि में सोने को अब आम आदमी की पहुंच से बाहर कर दिया है। ज्वेलर्स की शॉप से कुछ खरीदने की बात सोचनी तो दूर अब उसकी तरफ देखने की हिम्मत कर पाना भी आम आदमी के बस की बात नहीं है। 70—72 हजार तोले के जेवर का मतलब अब लाख तक पहुंच गए। आम आदमी तो इस बढ़ती महंगाई के दौर में नून—तेल व लकड़ी ही जुटा ले और उसके घर में दो वक्त का चूल्हा जल सके उसके पास इससे ज्यादा कुछ सोचने को बचा नहीं है। हाल यह है कि दालों के भाव तो 125 से 200 रुपए किलो है ही जिसके बारे में कहावत है कि किस खेत की मूली है वह मूली भी बाजार में 60 रूपये किलो है। सेब भले ही 80 रूपये किलो मिल जाए लेकिन टमाटर 100 रूपये प्रति किलो। फ्रासबीन और गोभी भी 100 रूपये किलो है। जिस कद्दू (काशीफल) के दाम 10 रूपये होते थे वह भी 40 रूपये किलो है। घी तेलों के दाम डेढ़ सौ से दो सौ रूपये लीटर के बीच है। ऐसी स्थिति में सिर्फ उन गरीबों को ही नहीं 400—500 रूपये प्रतिदिन जो कमाने वाले हैं उनकी स्थिति भी यह है कि उन्हें जीने के लिए आवश्यक वस्तुएं जुटाना मुश्किल हो रहा है। आम आदमी बाजार सिर्फ अपनी उन आवश्यकता की वस्तुएं खरीदने के लिए जा रहा है। आम आदमी का बाजार से बाहर हो जाना यानी 60—70 फीसदी आबादी से है। जब बाजार में खरीदार नहीं तो इसका प्रभाव छोटे उघोगों पर पड़ेंगे ही। देश पर कर्ज का बोझ भी लगातार बढ़ता जा रहा है। जिसका सीधा अर्थ है कि सरकार के पास भी पैसा नहीं है। पैसा होगा भी कहां से राजनीतिक दल और सत्ता में बैठे मंत्री और नेता एक तरफ मुफ्त की रेवड़ियंा बांटने में लगे हुए हैं वहीं सरकार पर सब्सिडी का बोझ भी बढ़ता जा रहा है। नोटबंदी और कोरोना के बाद अर्थव्यवस्था का जो बिगड़ना शुरू हुआ उसके साइड इफेक्ट अब सामने आने लगे हैं रही सही कमी को सरकार ने अनाप—शनाप जीएसटी व टैक्स लगाकर पूरी कर दी है। अभी आरबीआई बैंक की रेपो रेट में वृद्धि की गई थी जिससे आम आदमी की ईएमआई पर प्रभाव पड़ा है। रिजर्व बैंक द्वारा भी संभावित महंगाई बढ़ने की आशंका जाहिर की गई थी। अगर देश की अर्थव्यवस्था जिस पटरी पर दौड़ रही है उसका कर्म जारी रहता है तो आने वाले समय में देश के लोगों को और अधिक गंभीर समस्याएं झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए।

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