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मीडिया का दिशा भ्रम काल

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मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है लोकतंत्र में मीडिया की वही भूमिका होती है जो विपक्ष की होती है। सत्ता पक्ष के कार्यों की समालोचना करना और कार्यपालिका के गलत कामों को गलत कहने की सामर्थ्य अगर विपक्ष और मीडिया में नहीं रहती है तो वह लोकतंत्र की रक्षा करने के अपने दायित्व से विमुख होकर अपना अस्तित्व गवा देता है। बीते एक दशक का इतिहास इस बात का गवाह है कि मीडिया और विपक्ष दोनों ही अपने उत्तरदायित्वों के निर्वहन में विफल साबित हुए हैं जिसके कारण सत्ताधारी नेताओं में विपक्ष विहीन लोकतंत्र या यह कहे कि तानाशाही की मनोवृत्ति हिलोरे मारने लगी। मीडिया और चाटुकारिता का इतिहास कोई नया नहीं है लेकिन सत्ता पक्ष मीडिया और स्वायत्तधारी संस्थाओं को अपने कब्जे में कर लेगा इसकी कल्पना शायद मीडिया में बैठे लोगों ने भी नहीं की थी जो मीडिया संस्थान सत्ता के कब्जे में नहीं आए या जो मीडियाकर्मी सत्ता की नीतियों का अनुसरण करने को तैयार नहीं हुए उन्हें या तो खरीद लिया गया या उन्हें मीडिया से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। लेकिन ऐसे मीडिया संस्थानों या मीडिया कर्मियों की संख्या बहुत गिनती की ही है। जो इन परिस्थिति जन्य स्थिति में अपने अस्तित्व को बचा सके हैं। एक अन्य बात जो इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है वह यह है कि हमने बीते चार दशकों में पत्रकारिता में मीडिया कर्मियों को सर आंखों में बैठाने वाले तथा मीडिया संस्थानों का सम्मान करने वाले राजनीतिक दल और नेता तो तमाम देखे हैं लेकिन मीडिया संस्थाओं को और मीडिया कर्मियों को फटकारने वाला राजनीतिक दल और नेता शायद कोई नहीं देखा। उन्हें हमेशा ही मीडिया से यह खौफ रहता था कि अगर मीडिया उसके खिलाफ हुआ तो उसकी राजनीति का बंटाधार हो जाएगा। लेकिन इस वर्तमान के राजनीतिक दौर में कांग्रेस और खासकर राहुल गांधी के अंदर इस खौफ का खात्मा हो चुका है। अब कांग्रेस नेताओं का हर भाषण या पत्रकार वार्ता अथवा बयानों से यह साफ जाहिर होने लगा है क्योंकि वह मंच से ही उन मीडिया कर्मियों को खूब खरी खरी सुनने में कोई संकोच नहीं करते हैं। कांग्रेस के इस हौसले से उसके इंडिया गठबंधन के नेताओं को भी मीडिया से बेबाक बात करने का हौसला मिल चुका है। अब देश का मीडिया भी दो भागों में बंट चुका है एक हिस्सा अब गोदी मीडिया के नाम से जाना जाता है और दूसरे को मीडिया के नाम से। निश्चित ही वर्तमान दौर में जहां एक अलग तरह की राजनीति का उदय हो रहा है वही मीडिया का भी नया कायाकल्प होता दिख रहा है जो आने वाले लोकतंत्र, देश और समाज के लिए एक सुयोग कहा जा सकता है। बीते एक दशक के कालखंड का जो इतिहास लिखा जा चुका है उसको न तो राजनीतिक महत्व के दृष्टिकोण से और न मीडिया के दृष्टिकोण से अच्छा कहा जा सकेगा। वर्तमान दौर में देश का आम आदमी भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी की जिन समस्याओं से जूझ रहा है तथा गरीब अमीर के बीच की खाई जो निरंतर बढ़ती जा रही है और देश में कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है वह अत्यंत ही गंभीर समस्याएं हैं। आने वाली देश की सरकारें इस संकट से कैसे देश को निकाल पाएगी और कैसे इनका समाधान कर पाएगी यह तो आने वाला समय ही बताएगा लेकिन हालात की जटिलता और उसके प्रभाव से भले ही देश के 8—10 फीसदी अमीर लोग बच जाए लेकिन आम आदमी को इन संकटों का सामना करना ही पड़ेगा।

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