अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे और दान की हजारों करोड़ की जो चोरी का मुद्दा इन दिनों चर्चाओं की केंद्र में है जिसमें हर रोज अब नए—नए खुलासे हो रहे हैं उसे लेकर मेरे जहन को जो सवाल लगातार मथ रहे हैं उनमें पहला सवाल यह है कि आज श्री राम की सेवा में अपना संपूर्ण जीवन समर्पित करने वाले संत महंत सत्येंद्र दास जीवित होते तो उन पर क्या गुजर रही होती तथा वह अपनी आस्था के आलम्ब भगवान श्री राम मंदिर के इन डकैतों पर अपनी क्या प्रतिक्रिया देते? मैं सोचता हूं प्रभु राम ने उन्हें इस दिन को देखने से पहले ही अपने श्री चरणों में स्थान देकर अच्छा ही किया। दूसरा सवाल मेरे मन में उन अहंकारी लोगों को लेकर भी है जिन्होंने श्री राम के भक्तों को सड़कों पर ढोल बजा बजा कर सालों साल खूब नचाया ट्टजो राम को लाए हैं, हम उनको लायेंगे। क्या उन्हें भी इस चोरी को लेकर थोड़ी बहुत शर्मिंदगी है या नहीं? शायद उनके लिए हया—शर्म जैसे शब्द बने ही नहीं हैं। इस खुलासे से अब यह भी साबित हो गया है कि वह चाहे कोई नेता हो या किसी संस्था के सर्वाेच्च पद पर बैठा चंपत राय जैसा कोई व्यक्ति उनके गिरने की कोई सीमा नहीं होती है। ओउम नाथ पांडे की एक कविता है गिरो। गिरो। गिरो जो वर्तमान परिवेश पर एकदम खरी उतरती है जिसमें वह कहते हैं कि गिरो क्योंकि गिरने की अपरिमित संभावनाएं हैं। सत्ता में बैठे लोग जो बात करते थे राष्ट्रवाद की, जो बात करते थे विकसित राष्ट्र बनाने की, जो बात करते थे भारत को विश्व गुरु बनाने की वह उस हद तक गिर गए हैं कि उनके गिरने की कोई सीमा ही नहीं रह गई है। केंद्रीय सत्ता में बैठे एक राजस्थान के मंत्री जिनका नाम है मेघवाल अपने ही विभाग के किसानों को दी जाने वाली खीरे की सब्सिडी का 90 लाख खुद डकार जाते हैं। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव के द्वारा अपने 37 परिजनों के हजारों करोड़ की जमीन खरीद का मामला आता है तो वह इस खुलासे को सनातन का ही अपमान बता देते हैं। राम मंदिर से एक हजार करोड़ की चोरी हो जाती है और इसे इतने हल्के में लिया जाता है जैसे कहीं कुछ हुआ ही न हो। हैरान करने वाली बात यह है कि यह धर्म का जो धंधा 2019 में आए राम मंदिर निर्माण पर अदालत के फैसले के साथ ही शुरू हो गया था उसे केंद्र और उत्तर प्रदेश की सरकारे भला कैसे अनभिज्ञ हो सकती हैं। राम मंदिर के लिए एक जमीन को दो बार खरीदा जाना और सिर्फ 5 मिनट बाद ही ट्रस्ट को 14 करोड़ में बेचा जाना इस बात का सबूत है की आस्था के प्रतीक इस राम मंदिर निर्माण की ईंट ही उस भ्रष्टाचार के पत्थर से रखी गई थी जिसका आधा अधूरा सच अब सभी के सामने आ गया है। इसे लेकर अब लोग कह रहे हैं कि भाजपा और संघ के लोग कहीं मुंह दिखाने के काबिल नहीं बचे हैं? ऐसी स्थिति में सत्ता में बैठे कुछ लोगों को कुछ तो ऐसा करना ही चाहिए जिससे दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। कहां जा रहा है कि जब चप्पे—चप्पे पर सीसीटीवी कैमरो से नजर जाती थी अगर यह सच है तो ऐसा नहीं कि वह पकड़े नहीं जा सकते जिन्होंने यह कुकृत्य किया है। इसे भी छोड़िए सरकार जो एसआईआर के जरिए पूरे देश से ढूंढ ढूंढ कर घुसपैठियों को बाहर निकालने का दावा करती है वह कम से कम 2019 में जब राम मंदिर पर न्यायालय का फैसला आया से लेकर 2025 तक जब प्राण प्रतिष्ठा हुई के दौरान अयोध्या में हुई जमीनों की रजिस्ट्रियों की जांच कर ले उसे पता चल सकेगा कि आखिर इस राम मंदिर निर्माण के कार्य में कितना बड़ा खेल हुआ है पीएमओ के अधिकारी नृपेंद्र मिश्रा इस चोरी नहीं डकैती बता रहे हैं तो यह बेवजह नहीं है। भाजपा और संघ के दामन पर लगा यह दाग कोई मामूली दाग नहीं है। इसकी बड़ी कीमत उन्हें चुकानी पड़ेगी। देश का जन विश्वास खो देने से बड़ा नुकसान और भला क्या हो सकता है। विश्व गुरु और महामानव की छवि को तार—तार करने वाले इस मुद्दे को चुप रहकर रफा—दफा नहीं किया जा सकता है क्योंकि इस मुद्दे से देश की जन भावनाएं और आस्था जुडी हुई है।




