हेट स्पीच एक बड़ी समस्या

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देश के सभी समुदायों के बीच सद्भाव और सौहार्द बना रहे इसके लिए किसी भी कीमत पर हर हाल में नफरती भाषणों को रोका जाना चाहिए तथा केंद्र सरकार भड़काऊ और नफरती भाषणों को कैसे रोका जा सकता है इसके समाधान के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन करें। सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से यह स्पष्ट है कि यह समस्या अब देश की एक अति गंभीर समस्या बन चुकी है। हेट स्पीच की समस्या के बारे में दो खास बातें यह है कि यह कोई नई समस्या नहीं है दूसरी बात यह है कि इस समस्या की जड़ में देश की वह राजनीति है जो वोटो के ध्रुवीकरण से जुड़ी है। देश के नेताओं और राजनीतिक दलों ने भी कभी इस बात की जरूरत नहीं समझी कि वह जो कह रहे हैं और जो कर रहे हैं उसका समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा या इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे इस सोचने की भी जरूरत किसी ने भी नहीं सोची है। सभी दलों और नेताओं के द्वारा भारतीय संविधान की मूल भावना धर्मनिरपेक्षता और सर्वधर्म समभाव पर भाषण दिए जाते रहे हो लेकिन यही नेता तिलक, तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार और बोली से नहीं मानोगे तो गोली से मानोगे जैसे नारे और भाषण देने में कभी पीछे नहीं रहे। यह विडंबना ही रही है कि सभी राजनीतिक दलों और नेताओं द्वारा इस मुद्दे पर दोहरी नीति पर काम किया जाता रहा है। जाति धर्म और क्षेत्र के आधार पर देश को बांटने और समाज को लड़ाने की राजनीति अब नासूर बन चुकी है। मंदिर—मस्जिद और आरक्षण जिसे हम मंडल कमंडल की राजनीति कहते हैं सभी कुछ संप्रदायिकता विभाजन के मुद्दे रहे हैं। इस राजनीति ने हमें क्या दिया है? मणिपुर और हरियाणा के नूंह की घटनाएं इसका ताजा उदाहरण है। ऐसा भी नहीं है कि इस तरह की सांप्रदायिक हिंसा और दंगे पहली बार हुए हैं इनका एक लंबा इतिहास है। देश के लोग न गोधरा कांड को भूले हैं न 1984 के दंगों को। कहा तो यही जाता है कि भारत की पहचान ही इसकी बहुरंगी सामाजिक संरचना है। जिसमें विभिन्न समुदाय धर्मों के लोग जिनकी भाषा बोली और वेशभूषा अलग—अलग है किंतु इस अनेकता में एकता ही उसे विश्व के तमाम देशों से अलग बनाती है। पश्चिमी देशों में नस्लीय भेदभाव हमेशा ही बड़ी समस्या रहा है लेकिन अब हिंदुस्तान में नफरत की जो हवा बह रही है उसने देश के समाज और उसकी संस्कृति को झुलसाना शुरू कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट की चिंता गैर वाजिब इसलिए भी नहीं है क्योंकि वर्तमान दौर में लव जिहाद और लैंड जिहाद जैसे मुद्दों को भी उस हद तक हवा दी जा रही है जहां किसी समुदाय विशेष के सामाजिक बहिष्कार और आर्थिक प्रतिबंधों के कारण पलायन की स्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं। आज के इस डिजिटल युग में भ्रामक सूचनाओं का आदान—प्रदान जो अति सुगम हो गया है इस समस्या को बढ़ावा देने में आग में घी डालने जैसा काम कर रहा है। जिसके कारण स्थिति बेकाबू हो रही है। किसी भी सूरत में इस नफरत की आग को रोका जाना जरूरी है नूंह के मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को महसूस किया और अपनी टिप्पणी में इसे गैर संवैधानिक बताया। अहम सवाल यह है कि नेताओं द्वारा दिए जाने वाले नफरती भाषणों पर रोक कैसे लगाई जा सकती है? क्या केंद्र सरकार इसके लिए कुछ नए कानून लाने की पहल करेगी? या फिर राज्य सरकारों की कोई जिम्मेदारी तय होगी। बीते कल ही उत्तराखंड के डीजीपी अशोक कुमार ने इस बारे में अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि नफरती भाषणों के मामले में तुरंत एफआईआर दर्ज करें। निश्चित तौर पर इस समस्या के समाधान के लिए कठोर कदम उठाने की जरूरत है।

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