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सवालों के घेरे में कानून व्यवस्था

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उत्तराखंड की कानून व्यवस्था पर यूं तो लंबे समय से सवाल उठाए जाते रहे हैं विपक्ष कांग्रेस के नेताओं द्वारा इस मुद्दे को लेकर सड़कों से लेकर सदन तक घेराबंदी की जाती रही है लेकिन अभी हाल ही में प्रकाश में आई दो घटनाएं चर्चाओं के केंद्र में है जो यह बताती है कि राज्य में कानून और व्यवस्था की स्थिति किस हद तक बिगड़ चुकी है तथा जनता की सुरक्षा के लिए बनी पुलिस किस तरह से सत्ता के अनुकूल हो चुकी है। पहली घटना मुख्यमंत्री धामी के गृह जनपद चंपावत से है जहां कक्षा 10 में पढ़ने वाली एक छात्रा के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया जिसमें सत्ताधारी दल भाजपा के कुछ पदाधिकारी व नेताओं के शामिल होने की बात सामने आई है। इस बाबत कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल का एक वीडियो सोशल मीडिया पर लोगों ने देखा होगा जिसमें वह राज्य के सीएम तथा पुलिस महानिदेशक व चंपावत के अधिकारियों से पीड़िता की मदद करने की अपील कर रहे हैं। इस मुद्दे पर कांग्रेस की अलका लामा और कांग्रेस नेत्री गरिमा दसौनी ने अपनी पत्रकार वार्ता में भाजपा के चाल चरित्र और चेहरे पर कई तरह के सवाल दागते हुए पूछा है कि क्या बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ का नारा देने वाली पार्टी इन आरोपियों को जिनका रसूक भाजपा से है इस बेटी को न्याय दिलाएगी उन्होंने अपनी बात सामने रखते हुए अंकिता भंडारी मर्डर केस से लेकर उन तमाम अन्य महिला अपराध की घटनाओं पर भी चिंता जताई है जो भाजपा के नेताओं से जुड़ी रही हैं। उन्होंने भाजपा पर देवभूमि को कलंकित करने का आरोप लगाते हुए भाजपा सरकार को इन अपराधियों को संरक्षण देने की बात कही है। दूसरी घटना सतपुली क्षेत्र की है जिसमें एक दलित 20 वर्षीय युवक को पुलिस द्वारा इतनी बेरहमी से पीटा गया कि वह अधमरा हो गया पुलिस उत्पीड़न से आहत युवक ने पुल से लटक कर आत्महत्या कर ली है। युवक का अपराध यह था कि उसकी बाइक का पहिया भाजपा नेता के पैर से टकरा गया। यह मामला भी इतना ज्यादा तूल पकड़ गया कि गणेश गोदयाल और क्षेत्र के लोगों को सतपुली थाने पर धरना प्रदर्शन करना पड़ा। भले ही लोगों को यह लगे कि इस तरह की घटनाएं बहुत मामूली सी बात है तथा विपक्ष कांग्रेस इन घटनाओं पर राजनीति कर रहा है लेकिन बीते समय में महिलाओं के यौन उत्पीड़न तथा दलित उत्पीड़न के तमाम ऐसे मामले सामने आ चुके हैं जो इस बात को साफ करते हैं कि इन अपराधों से भाजपा और उसके नेताओं का या तो सीधा संबंध रहा है या फिर सत्ता में बैठे लोगों का इन अपराधियों को संरक्षण प्राप्त हो रहा है। बीते कुछ सालों में जिस तरह से अपराधों की बाढ़ आई है उसका सच किसी से छुपा नहीं है। पूरे प्रदेश की तो बात ही क्या है अगर राजधानी दून के अपराधों पर ही गौर करें तो लगभग आधा दर्जन से अधिक हत्याओं के मामले प्रकाश में आ चुके हैं। आए दिन दिनदहाड़े गोलियों से किसी को भी भून दिया जाता है सरे बाजार चपड़ से किसी का भी गला काट दिया जाता है। किसी सर्राफ के शोरूम से करोड़ों की डकैती हो जाती है। निश्चित तौर पर राज्य की बिगड़ती कानून व्यवस्था एक गंभीर समस्या और चुनौती बन चुकी है हत्याओं लूटपाट व बलात्कार की घटनाओं की जिस तरह से बाढ़ आ चुकी है वह अत्यंत ही चिंतनीय है। खास बात यह है कि अब शासन—प्रशासन अपराधों पर नियंत्रण के मामले में फेल साबित होता दिख रहा है उससे भी चिंतनीय बात यह है कि पुलिस सिर्फ उन्हीं मामलों पर गौर करती है जो सरकार या भाजपा के नेता व कार्यकर्ताओं की सुरक्षा या उनके बचाव से जुड़े होते हैं।

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