- तिबारी बरामदा नहीं, पहाड़ की सामाजिक चौपाल
- लकड़ी की नक्काशी में बसती थी पहाड़ की कला
- पलायन और आधुनिकता ने छीनी तिबारी की रौनक
देहरादून। उत्तराखंड के पारंपरिक पहाड़ी घर केवल पत्थर, लकड़ी और मिट्टी से बने मकान नहीं होते थे, बल्कि पहाड़ की संस्कृति, जीवनशैली और सामाजिक रिश्तों की जीवित तस्वीर होते थे। इन्हीं पारंपरिक घरों की सबसे खास पहचान होती थी तिबारी। आज आधुनिकता की दौड़ में तिबारी धीरे-धीरे पहाड़ के घरों से गायब होती जा रही है, लेकिन एक समय ऐसा था जब हर पहाड़ी घर की रौनक और आत्मा तिबारी ही होती थी।
तिबारी पहाड़ी घर का खुला बरामदा या लकड़ी से बना सामने का हिस्सा होता था। इसे घर की ऊपरी मंजिल में बनाया जाता था, जहां से दूर-दूर तक पहाड़, खेत और गांव दिखाई देते थे। लकड़ी की खूबसूरत नक्काशीदार खिड़कियां और मजबूत खंभे इसकी पहचान होते थे। तिबारी केवल बैठने की जगह नहीं थी, बल्कि यह पहाड़ के सामाजिक जीवन का केंद्र हुआ करती थी। यहां परिवार के लोग बैठकर बातें करते, मेहमानों का स्वागत होता, बच्चे खेलते और बुजुर्ग गांव की खबरों पर चर्चा करते थे।
पुराने समय में जब गांवों में टीवी, मोबाइल और इंटरनेट नहीं थे, तब तिबारी ही लोगों के मेलजोल का सबसे बड़ा स्थान होती थी। शाम होते ही गांव के लोग तिबारी में बैठकर लोकगीत गाते, ढोल-दमाऊ की थाप पर सांस्कृतिक चर्चाएं होतीं और गांव के सुख-दुख साझा किए जाते। तिबारी ने पहाड़ की सामूहिक संस्कृति को जीवित रखने में बड़ी भूमिका निभाई। यहां रिश्ते बनते थे, परंपराएं आगे बढ़ती थीं और नई पीढ़ी बुजुर्गों से लोककथाएं और जीवन के अनुभव सुनती थी।
तिबारी केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृदृष्टि से भी बेहद उपयोगी होती थी। पहाड़ की जलवायु को ध्यान में रखकर इसका निर्माण किया जाता था। गर्मियों में यहां ठंडी हवा मिलती थी, जबकि सर्दियों में धूप का आनंद लिया जाता था। लकड़ी और पत्थर से बने यह घर पर्यावरण के अनुकूल होते थे। तिबारी में बड़ी खिड़कियां और खुलापन होने के कारण घर में प्राकृतिक रोशनी और हवा आसानी से आती थी। यह पहाड़ की पारंपरिक वास्तुकला की अनूठी पहचान थी।
समय बदला, सीमेंट के मकान बनने लगे और पहाड़ की पारंपरिक वास्तुकला धीरे-धीरे पीछे छूटने लगी। आज नए घरों में तिबारी की जगह बालकनी और आधुनिक डिजाइन ने ले ली है। पलायन ने भी इस परंपरा को गहरा आघात पहुंचाया। गांव खाली होने लगे और कई पुराने घर खंडहर बन गए, जिन तिबारियों में कभी लोकगीत गूंजते थे, वहां अब सन्नाटा पसरा दिखाई देता है। तिबारी केवल एक निर्माण शैली नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत है। यह पहाड़ के सामूहिक जीवन, अपनापन और प्रकृति से जुड़े रहने की सोच का प्रतीक रही है। आज जरूरत इस बात की है कि नई पीढ़ी को तिबारी और पारंपरिक पहाड़ी वास्तुकला के महत्व से परिचित कराया जाए। यदि आधुनिक निर्माण में पारंपरिक शैली को जोड़ा जाए, तो यह विरासत फिर से जीवित हो सकती है।
पहाड़ के घरों की तिबारी केवल लकड़ी का बरामदा नहीं थी, बल्कि वह रिश्तों की गर्माहट, संस्कृति की पहचान और प्रकृति से जुड़े जीवन का प्रतीक थी। बदलते समय के साथ भले ही तिबारियां कम होती जा रही हों, लेकिन पहाड़ की यादों और लोकसंस्कृति में उनका स्थान आज भी अमिट है।




