प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके निकटतम सहयोगी अमित शाह जिन्हें अब देश के नेता राजनीति का चाणक्य कहते हैं, के नेतृत्व में भाजपा निरंतर चुनावी जीत दर जीत दर्ज करती हुई उस मुकाम तक पहुंच चुकी है जहां कभी कांग्रेस हुआ करती थी। कांग्रेस की उस बुलंदी का कारण था उसका राजनीतिक एकाधिकार जहां उसे चुनौती देने वाला कोई दूसरा बड़ा प्रतिद्वंद्वी था ही नहीं लेकिन वर्तमान की भाजपा ने यह उपलब्धि लंबे संघर्ष तथा तमाम छोटे बड़े दलों की चुनौतियों का सामना करते हुए की है जिसके लिए वह बधाई के पात्र हैं। लेकिन उसे उसकी राजनीतिक सफलताओं के लिए बधाई देने वाले भी इस बात को कहने से चूकते नहीं है कि उसने यह सफलता संवैधानिक व्यवस्थाओं और मान्यताओं तथा परंपराओं की बलि चढ़ा कर हासिल की है। यही कारण है कि विपक्षी दल और उनके नेताओं के लिए संविधान और लोकतंत्र बचाओ का मुद्दा 70 के दशक के आपातकाल जैसा ही अहम हो गया है। यह बात अलग है कि विपक्षी नेता अपने—अपने निजी स्वार्थो की प्रतिपूर्ति के चलते आपातकाल की तरह एकजुट नहीं हो सके हैं जिसका लाभ उठाते हुए भाजपा एक—एक कर क्षेत्रीय क्षत्रपों और राजनीतिक दलों को तहस—नहस करती चली जा रही है। पंजाब से अकाली दल महाराष्ट्र से शिवसेना, बिहार से जेडीयू तथा राजद यूपी से बसपा और दक्षिण भारत सहित देश के अन्य तमाम राज्यों से कितने दलों का अस्तित्व समाप्त हो चुका है। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी दलों ने जो इंडिया के नाम से एक संयुक्त मोर्चा बनाया था भले ही वह नीतीश कुमार और ममता बनर्जी जैसे नेताओं के अहम ने उसे सफल नहीं होने दिया हो लेकिन इसके बावजूद भी उसने 400 पार का नारा देने वाली भाजपा को 240 पर ही लाकर खड़ा कर दिया था मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और बिहार के सुशासन बाबू जो अब पूर्व सीएम हो चुके हैं उनका तथा उनके दलों का भविष्य क्या होगा यह तो आने वाला समय ही तय करेगा, हां उसे भाजपा को किए गए असाधारण सहयोग से मोदी की सरकार अपनी सफलता की नई कहानी लिखने में सफल जरूर रही है। आने वाले दिनों में पंजाब में चुनाव होना है जहां आप की सरकार है। इसके बाद उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के चुनाव हैं देखना होगा कि दिल्ली, हरियाणा, महाराष्ट्र और बिहार के बाद पश्चिम बंगाल में विजय पताका फहराने वाली भाजपा अरविंद केजरीवाल और समाजवादी पार्टी को कितना नुकसान पहुंचाती है। जिस तरह तेजी से क्षेत्रीय क्षत्रपों का सफाया हो रहा है उतनी ही तेजी से भाजपा बुलंदियों की ओर अग्रसर है। विपक्ष के नेताओं को यह समझ ही नहीं आ रहा है कि यह हो क्या रहा है क्योंकि भाजपा ने उन्हें एसआईआर तथा स्टीन फाइल जैसे मुद्दों में या फिर नारी वंदन अधिनियम जैसे मुद्दों में उलझा रखा है। या फिर विपक्षी नेता सीबीआई और ईडी के फंदे से बचने की जोड़ जुगाड़ में ही लगे रहते हैं। इस सभी हालातो के बीच एक अहम सवाल यह है कि जिस लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन होती है उसने भाजपा के वर्तमान चाल चरित्र और चेहरे को इस रूप में स्वीकार कर लिया है जैसी भाजपा और उसके नेता हैं? उसकी चुनावी जीत तो यही बताती है। अगर जनता को वह सब स्वीकार नहीं होता जो सत्ता में रहकर भाजपा के नेता या सरकारें कर रही हैं तो फिर उसे वह वोट क्यों देती? अगर यह सच नहीं है तो क्या वह सच है जिसमें ममता बनर्जी 100 सीटों की चोरी करने की बात कह रही है या फिर यह सच है कि देश से लोकतंत्र खत्म हो चुका है, आप भी इस पर मंथन कीजिए?




