गलत निर्णय तो गलत परिणाम

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चार धाम यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की मौतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है, बीते कल भी एक यात्री की मौत खाई में गिरने और एक की हृदय गति रुकने से हो गई। भले ही सरकारी आंकड़े 23 लोगों की मौत बता रहे हो लेकिन यात्रा के दौरान अब तक 28 लोगों की मौत हो चुकी है। यह शासन—प्रशासन की संवेदनहीनता और अपनी अकर्मण्यता को छुपाने का प्रयास ही है कि मुख्यमंत्री इन मौतों पर यह बयान दे रहे हैं कि भगदड़ के कारण एक भी मौत नहीं हुई है या स्वास्थ्य निदेशक यह कह रही है कि अस्पताल में किसी यात्री की मौत नहीं हुई है। शासन—प्रशासन में बैठे लोगों को जब यह अनुमान था कि इस बार अधिक संख्या में तीर्थयात्री आने वाले हैं तो उन्होंने उसके अनुसार ही यात्रा की तैयारियां क्यों नहीं की। इस यात्रा के कुशल संचालन के लिए यह जरूरी था कि सरकार ऐसा सिस्टम तैयार करती जिससे क्षमता से अधिक यात्री धामों में नहीं पहुंच पाते जो अवस्थाएं फैलने का सबसे अहम कारण है। इसके लिए शासन प्रशासन को एक मैकेनिज्म तैयार करना चाहिए था। वही यात्रियों के स्वास्थ्य जांच की भी कोई व्यवस्था नहीं की गई और अब जब लोग मर रहे हैं तो कहा जा रहा है कि वह पुरानी बीमारियों से ग्रसित थे। सवाल यह है कि बीमार, अति कमजोर और वृद्ध लोगों को हाई एंट्री ट्यूट वाले क्षेत्रों में जाने से रोका क्यों नहीं गया। दरअसल यह सब अनुभवहीनता और कमजोर निर्णय शक्ति का परिणाम है। सरकार द्वारा पहले हर एक धाम में एक दिन में कितने यात्री पहुंचेंगे इसकी सीमा तय नहीं की गई और जितनी व्यवस्था थी उसके अनुसार यह मान लिया गया था कि इतने यात्री जाएंगे। जब यात्री अधिक यानी कई गुना ज्यादा पहुंच गए तो फिर मुख्यमंत्री हर धाम में एक—एक हजार यात्री संख्या बढ़ाकर बताने लगे कि यहां इतने जाएंगे और वहां इतने। खास बात यह है कि यह देखने या जांचने की कोई व्यवस्था कहीं नहीं की गई की जा कितने लोग रहे हैं यही कारण है कि कि सीएम के द्वारा संख्या तय करने के बाद भी भीड़ कम नहीं हुई। बीते कल फिर जब नियमों के कड़ाई से पालन की बात कही गई तो पुलिस ने अब बिना रजिस्ट्रेशन यात्रा पर जाने वालों को रोकना शुरू किया है। यह कोई पहला मर्तबा नहीं है कोरोना काल में हरिद्वार कुंभ के दौरान भी त्रिवेंद्र सिंह की कुर्सी जाने का कारण उनके निर्णय ही बने थे। भले ही तीरथ रावत द्वारा केंद्र सरकार के इशारे पर सभी प्रतिबंधों में ढील, कोरोना विस्फोट का कारण बनी सही लेकिन शासन की निर्णय अक्षमता किसी भी स्थिति को किस तरह बिगाड़ देती है इसका प्रमाण वर्तमान चार धाम यात्रा है। कुंभ का आयोजन भी संतों की नाराजगी मोल न लेने के कारण हुआ था और अब चार धाम में यात्रियों की संख्या पर पाबंदी लगाने का फैसला सीएम ने तीर्थ पुरोहितों व व्यापारियों के विरोध के दबाव में लिया था जिसका खामियाजा अब सरकार और तीर्थयात्री भोग रहे हैं।

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