कुशल वित्तीय प्रबंधन जरूरी

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आगामी मार्च माह में सूबे की धामी सरकार गैरसैंण में बजट सत्र का आयोजन करने जा रही है। जिसमें वित्त मंत्री प्रेमचंद्र अग्रवाल वर्ष 2023—24 का बजट पेश करने वाले हैं। मोटा मोटी बजट का अब तक यही होता रहा है कि सरकार के पास पैसा कहां से आएगा और कितना आएगा तथा इस पैसे को सरकार किस—किस मद पर कितना खर्च करेगी। अधिक से अधिक आय अर्जित करने और इस आय को प्राथमिकताओं के आधार पर तय जरूरतों और मदों पर खर्च किए जाने को ही हम कुशल वित्तीय प्रबंधन कहते हैं। अगर इस बात पर गौर किया जाए कि धामी सरकार का वित्तीय प्रबंधन कैसा रहा है तो उन्हें 10 में से सिर्फ 5 अंक ही दिए जा सकते हैं। क्योंकि सरकार का राजस्व प्राप्तियों का लक्ष्य तो ठीक रहा ही नहीं है। अपितु बजट सत्र में भी सरकार फिसड्डी साबित ही हुई है। सरकार को विभिन्न मदों और करों से राजस्व की जितनी प्राप्ति होनी चाहिए थी वह 35 फीसदी से कम रही है। राज्य सरकार को जिस खनन और ऊर्जा से जितनी प्राप्ति होनी चाहिए थी उसकी आधी भी नहीं हुई है। फरवरी तक सरकार 27270 करोड़ की आय के सापेक्ष 18210 करोड़ की प्राप्ति ही हुई है अब विभागीय समीक्षा के बाद सरकार ने उन विभागों को कड़ी फटकार लगाते हुए बकाया वसूली के आदेश दिए गए हैं जो लक्ष्य से काफी पीछे रहे हैं। धामी का कहना है कि सभी विभागों को वित्तीय वर्ष के पहले महीने से ही इसका ख्याल रखना चाहिए। अगर सरकार के बजट खर्च पर एक नजर डालें तो वर्ष 2022—23 में सरकार ने 71,01792 करोड़ के बजट के सापेक्ष 71,79093 करोड़ स्वीकृत किया लेकिन विभागों द्वारा खर्च सिर्फ 2941289 करोड़ ही किया जो कि सिर्फ 58.8 प्रतिशत ही है। कहने का आशय है कि प्राप्तियां तो 33 फीसदी लक्ष्य से कम रही हैं लेकिन बजट का 60 फीसदी भी खर्च नहीं किया। ऐसी स्थिति में क्या सरकार के वित्तीय प्रबंधन को उचित ठहराया जा सकता है सही मायने में इससे अधिक लचर वित्तीय प्रबंधन और कुछ नहीं हो सकता। मुख्यमंत्री धामी कहते हैं कि आय और खर्च की निरंतरता बनी रहनी चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि इसकी जिम्मेवारी तो सरकार की है। उत्तराखंड जो एक छोटा सा राज्य है और उसका वार्षिक बजट भी बहुत कम है अगर इतने छोटे से बजट का भी राज्य समुचित उपयोग नहीं कर पा रहा है तो अगर उत्तराखंड की स्थिति उत्तर प्रदेश जैसी होती जहां का बजट 6 लाख करोड़ के आसपास है ऐसी स्थिति में हालात क्या होते? राज्य सरकार को अपने कुल बजट का 70 प्रतिशत तो पेंशन और कर्मचारियों के वेतन पर ही खर्च करना पड़ जाता है ऐसे में बाकी बचता ही क्या है अगर कर्ज का ब्याज भी निकाल दिया जाए तो विकास योजनाओं के लिए तो सिर्फ नाम मात्र का ही पैसा बचता है उसे भी अगर ठीक से प्रयोग में न लाया जा सके तो फिर ऐसी स्थिति को ठीक नहीं कहा जा सकता है। राज्य गठन के दो दशक बाद भी अगर राज्य को अपनी छोटी—छोटी जरूरतों के लिए केंद्र पर निर्भर रहना पड़े तो इसे ठीक नहीं कहा जा सकता। सरकार को अपनी आय वृद्धि और खर्चे के तरीकों में सुधार की जरूरत है सिर्फ साल के अंत में की जाने वाली समीक्षा ही काफी नहीं है।

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