एकजुटता ही लगायेगी कांग्रेस की नैय्या पार

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कांग्रेस को कोई हरा सकता है तो वह खुद कांग्रेसी ही हरा सकते है। अगर कांग्रेसी नेता इस सत्य से इत्तेफाक रखते हैं तो उन्हें इस सत्य को स्वीकार कर लेना चाहिए कि कांग्रेस की उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश व पंजाब सहित जिन तमाम राज्यों में पराजय दर पराजय हो रही है तो इसके लिए कोई और जिम्मेदार नहीं है खुद कांग्रेसी नेता ही जिम्मेदार है। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी यह बात कांग्रेस नेताओ से कही। उन्होने कांग्रेस की मजबूती के लिए सभी कांग्रेसी दिग्गजों को एकजुटता दिखाते हुए एक मंच पर आने की हिदायत दी थी। इस बात की पुष्टि करते हुए बीते रोज कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा पूर्व नेता प्रतिपक्ष प्रीतम सिंह के आवास पर उनके साथ मुलाकात के बाद कही गयी। कांग्रेस में गुटबाजी का आलम यह है कि बीते दिनों उत्तराखंड के पूर्व एआईसीसी सदस्य योगेंद्र खंडूरी ने भी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष खडगेे को पत्र लिखकर कहा कि प्रदेश कांग्रेस के नेता जिस तरह से गुटबाजी में फंसे हुए हैं उससे न तो पार्टी की छवि सुधर पा रही है और न संगठन मजबूत हो पा रहा है। भले ही प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता इस बात का दावा करें कि कांग्रेस में कोई गुटबाजी नहीं है लेकिन यह सिर्फ सफेद झूठ है। पोस्टर—बैनरों में फोटो छपने से लेकर पार्टी के कार्यक्रमों में अपनी—अपनी ढपली और अपना अपना राग अलापने वाले कांग्रेसी नेता एक दूसरे पर कीचड़ उछालने का कोई एक भी मौका नहीं छोड़ते हैं। जो इन नेताओं के आपसी मतभेद और मनभेदों को बताने के लिए काफी है। इसका ताजा उदाहरण है दो दिन पूर्व नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य की बैठक में कुछ कांग्रेसी नेता मंच पर स्थान न मिल पाने व बैनरो में अपनी फोटो नहीं लग पाने के कारण बैठक का बहिष्कार कर चले गये थे। सच अगर पूछा जाए तो कांग्रेस को उत्तराखंड में कमजोर करने में मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए छिड़े घमासान ने ही सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है। स्व. एनडी तिवारी को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद से शुरू हुआ यह विवाद आज तक भी जारी है। 2012 के चुनाव परिणाम के बाद जब कांग्रेस सत्ता में आई तो दिल्ली से लेकर दूून तक सीएम पद को लेकर जो जंग छिड़ी थी उसने हाईकमान को भी असहज कर दिया था। विजय बहुगुणा सीएम बन गए लेकिन उन्हें पूरे कार्यकाल टिकने नहीं दिया गया और हरीश रावत सीएम बन गए जिसका नतीजा पार्टी में बड़े विभाजन के रूप में सामने आया। यह हास्यास्पद बात है कि 2017 में तो कांग्रेस बुरी तरह हार ही गई, 2022 में भी उसे करारी हार का सामना करना पड़ा लेकिन चुनाव में सीएम की लड़ाई अपने चरम पर रही। यह हाल तब रहा जब सीएम पद के लिए लड़ने वाले भी खुद चुनाव नहीं जीत सके। कांग्रेस नेताओं को अब यह समझ में आना चाहिए कि एक जुटता ही कांग्रेस की नैय्या पार लगा सकती है। जिसके अलावा कांग्रेस के पास और कोई विकल्प भी नहीं है।

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