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‘गंगा दशहरा’ : जिस दिन माँ गंगा शिव की जटाओं से पृथ्वी पर अवतरित हुई!

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  • लोकेंद्र सिंह बिष्ट
    प्रांत संयोजक
    गंगा विचार मंच उत्तराखण्ड उत्तरकाशी।

आइए जानते हैं माँ गंगा जी के स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरण के बारे में।
गँगा सप्तमी— पौराणिक शास्त्रों के अनुसार वैशाख मास शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मां गंगा जी ने स्वर्ग लोक से गमन किया और शिवशंकर जी ने माँ गंगा जी को अपनी जटाओं में थाम लिया। इसलिए इस दिन को गंगा सप्तमी के रूप में मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि माँ गंगा जी लगभग 32 दिनों तक शिव जी की जटाओं में विचरण करती रहीं, बहती रही, घूमती रही है।और फिर, ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को भगवान शिव ने अपनी एक जटा खोली और गंगा माँ धरती पर अवतरित हुई। जिस दिन माँ गंगा जी शिव की जटाओं से पृथ्वी पर अवतरित हुई वह दिन श्गंगा दशहराश् (ज्येष्ठ शुक्ल दशमी) के नाम से जाना जाता है।
आइए जानते हैं कुछ और तथ्य मां गंगा जी के स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरण के बारे में। पौराणिक कथाओं के अनुसार माँ गंगा जी भगवान ब्रह्मा की पुत्री है। ब्रह्माजी ने इन्हें अपने कमंडल के जल से उन्हें उत्पन्न किया था। इसके अलावा, कुछ ग्रंथों में उन्हें पर्वतराज हिमवान (हिमालय) और रानी मैनावती की पुत्री भी माना गया है। इस मान्यता के अनुसार वे देवी पार्वती की बहन है। गंगा जी में किसी भी अवसर या पर्व पर मां गंगा में डुबकी लगाने से मनुष्य के सभी पाप धुल जाते हैं और मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है। माँ गंगा में स्नान का अपना अलग ही महत्व है, लेकिन इस दिन स्नान करने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्ति पा जाता है। कहा जाता है कि गंगा नदी में स्नान करने से दस पापों का हरण होकर अंत में मुक्ति मिलती है। इस दिन दान—पुण्य का विशेष महत्व है। शास्त्रों में उल्लेख है कि जीवनदायिनी गंगा में स्नान से ही सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है।
गंगा जी को हिंदू धर्म में पवित्रता और क्षमा की देवी के रूप में भी पूजा की जाती है। अनेक नामों से जानी जाने वाली गंगा जी को अक्सर एक सुंदर, आकर्षक स्त्री के रूप में चित्रित किया जाता है, जो मकर नामक एक दिव्य मगरमच्छ जैसे प्राणी पर सवार होती है । जिसके माता पिता हिमवान और मैनावती हैं और भाई—बहन पार्वती , मैनाक है।। शांतनु से ब्याही गंगा जी भीष्म और 7 अन्य पुत्र हुए। गंगा का सबसे प्रारंभिक उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है , जहाँ उसे सबसे पवित्र नदी बताया गया है। उसकी कथाएँ मुख्य रूप से रामायण, महाभारत और पुराण जैसे उत्तर — वैदिक ग्रंथों में मिलती हैं ।
रामायण में उन्हें हिमालय के अवतार हिमवत की प्रथम संतान और देवी पार्वती की बहन बताया गया है । हालांकि, अन्य ग्रंथों में उनके जन्म का उल्लेख संरक्षक देवता विष्णु से मिलता है । पौराणिक कथाओं में उनके पृथ्वी पर अवतरण पर जोर दिया गया है, जो राजऋषि भागीरथ के कारण हुआ था , जिन्हें भगवान शिव का सहयोग प्राप्त था । महाभारत महाकाव्य में , गंगा योद्धा भीष्म की माता हैं, जिनका जन्म कुरु राजा शांतनु से हुआ था ।
हिंदू धर्म में गंगा को मानव जाति की माता के रूप में देखा जाता है। तीर्थयात्री अपने परिजनों की अस्थियों को गंगा नदी में विसर्जित करते हैं, जिससे आत्माओं को मोक्ष प्राप्त होता है, जो जीवन—मृत्यु के चक्र से मुक्ति है। गंगा दशहरा और गंगा जयंती जैसे त्योहार गंगा के सम्मान में गंगा के तट पर स्थित कई पवित्र स्थानों पर मनाए जाते हैं, जिनमें गंगोत्री , हरिद्वार , प्रयागराज , वाराणसी और कोलकाता का काली घाट शामिल है। थाईलैंड में लोई क्राथोंग उत्सव के दौरान गौतम बुद्ध के साथ गंगा की पूजा की जाती है।
गंगा दशहरा (ज्येष्ठ शुक्ल दशमी) देवी गंगा के स्वर्ग से धरती पर अवतरण की पौराणिक कहानी है। राजा भागीरथ ने अपने पूर्वजों (सगर के 60,000 पुत्रों) की आत्मा की शांति के लिए कठोर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर गंगा धरती पर आने को तैयार हुईं, लेकिन उनके वेग को संभालने के लिए शिवजी ने उन्हें अपनी जटाओं में रोक लिया और फिर धरती पर छोड़ा। राजा सगर के 60,000 पुत्रों को कपिल मुनि ने अपने कोप से भस्म कर दिया था और उनकी आत्माएं मुक्ति के लिए भटक रही थी। राजा भगीरथ ने पूर्वजों के तर्पण के लिए ब्रह्मा और गंगा की कठोर तपस्या की। जिसके चलते मां गंगा जी धरती पर आने के लिए तैयार हो गईं, लेकिन उन्होंने कहा कि उनके वेग से पृथ्वी फट जाएगी। तब राज भागीरथ ने शिवजी को अपनी तपस्या से प्रसन्न किया। जब गंगा स्वर्ग से उतरीं, तो शिवजी ने उन्हें अपनी जटाओं में कैद कर लिया और फिर एक छोटी धारा के रूप में पृथ्वी पर छोड़ा। गंगा जी की पवित्र धारा ने भगीरथ के पूर्वजों का उद्धार किया। मान्यता है कि इस दिन गंगा में स्नान करने से 10 प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है (दश—हरा) यह पर्व ज्ञान, शुद्धता और मोक्ष का प्रतीक है। इस दिन गंगा तटों (हरिद्वार, वाराणसी, ऋषिकेश) पर विशेष पूजा—अर्चना और गंगा आरती होती है। मान्यता के अनुसार इस दिन 10 की संख्या में दान, स्नान और पूजा की जाती है।

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