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अंकिता प्रकरण पर सत्ता भयभीत

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सत्ता इतनी कमजोर कब से हो गई कि एक बेटी के लिए न्याय मांगते मां-बाप उसकी ताकत को चुनौती देने लगे? सरकार के पास पुलिस है, प्रशासन है, कानून है, सत्ता का पूरा तंत्र है। दूसरी तरफ एक परिवार है, जिसने अपनी बेटी खोई है और अब उसके हिस्से का न्याय मांग रहा है। फिर इतना डर किस बात का है? कौन-सा ऐसा सवाल है, जिससे सत्ता की पेशानी पर बल पड़ रहे हैं? और कौन-सा ऐसा सच है, जिसे सामने आने से रोकने के लिए न्याय की गुहार लगाते परिवार को ही हिरासत में लेने की नौबत आ रही है? दिल्ली के इंडिया गेट पर अंकिता भंडारी के माता-पिता का धरना केवल एक परिवार का विरोध नहीं है। यह उस व्यवस्था के सामने खड़ा सवाल है, जो बड़े-बड़े मंचों से न्याय, नारी सम्मान और संवेदनशील शासन की बातें करती है, लेकिन जब एक पीड़ित परिवार अपनी मांग लेकर सामने आता है तो उसे सुनने के बजाय उसकी आवाज रोकने की तस्वीर सामने आती है। अंकिता के माता-पिता को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया। सवाल यह नहीं कि पुलिस के पास कार्रवाई का अधिकार है या नहीं। सवाल यह है कि क्या इस अधिकार का इस्तेमाल न्याय मांगने वालों को चुप कराने के लिए किया जाना चाहिए? अंकिता भंडारी की हत्या ने पूरे उत्तराखंड को झकझोर दिया था। उन्नीस साल की युवती की जिंदगी छीन ली गई। मामले में अदालत ने तीन आरोपितों को दोषी ठहराकर आजीवन कारावास की सजा सुनाई। कानून ने अपना काम किया, लेकिन अंकिता के माता-पिता के मन में कथित वीआइपी की भूमिका और जांच के कुछ पहलुओं को लेकर सवाल अब भी हैं। वह उन सवालों का जवाब चाहते हैं। वह जांच की मांग कर रहे हैं। वह चाहते हैं कि जिन आशंकाओं को लेकर वह लगातार आवाज उठा रहे हैं, उनका निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से निस्तारण हो। क्या यह मांग इतनी अनुचित है कि परिवार को हिरासत में लेना पड़े? क्या किसी आरोप की जांच मांगना अपराध है? क्या सरकार से सवाल पूछना व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह है? यदि आरोप निराधार हैं तो जांच और तथ्यों के आधार पर उनका जवाब दिया जाए। यदि कोई पहलू जांच के दायरे में है तो उसकी स्थिति स्पष्ट की जाए। लेकिन सवाल उठाने वालों को ही कटघरे में खड़ा कर देने से सवाल खत्म नहीं होते। वह और गहरे होते हैं। यह भी साफ रहना चाहिए कि किसी व्यक्ति का नाम किसी आरोप में लिया जाना उसे दोषी सिद्ध नहीं करता। कथित वीआइपी की भूमिका से जुड़े सवालों का फैसला राजनीतिक बयानबाजी नहीं, साक्ष्य और निष्पक्ष जांच ही कर सकते हैं। लेकिन निष्पक्ष जांच की मांग को ही दबा देने की कोशिश हो तो व्यवस्था की नीयत पर सवाल उठना स्वाभाविक है। एक मां-बाप के लिए बेटी को खोने का दुख शब्दों में नहीं समेटा जा सकता। उस दुख के साथ वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा करना और फिर अपनी मांग लेकर दिल्ली की सड़कों पर उतरना किसी राजनीतिक तमाशे का हिस्सा नहीं है। यह उस पीड़ा का विस्तार है, जिसे परिवार अब तक अपने भीतर ढो रहा है। ऐसे परिवार की आवाज को संवेदनशीलता से सुना जाना चाहिए था। उसकी मांगों पर गंभीरता से विचार होना चाहिए था। लेकिन हिरासत की खबर सामने आती है तो सबसे पहला सवाल यही उठता है कि आखिर बातचीत और समाधान के रास्ते इतने संकरे क्यों पड़ गए? लोकतंत्र में प्रदर्शन के नियम होते हैं। सार्वजनिक स्थानों पर कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है। लेकिन नियमों का पालन कराने और किसी की आवाज दबाने के बीच एक महीन रेखा होती है। प्रशासन को बताना चाहिए कि हिरासत की कार्रवाई किन परिस्थितियों में की गई, उसका कानूनी आधार क्या था और परिवार को अपनी बात रखने का क्या विकल्प दिया गया। सत्ता की जवाबदेही केवल विपक्ष के सवालों का जवाब देना नहीं है। नागरिक के अधिकारों की रक्षा करना भी है। राजनीतिक मंचों पर महिला सम्मान के नारे लगाना आसान है। बेटियों की सुरक्षा को सरकार की प्राथमिकता बताना भी आसान है। कठिन परीक्षा तब होती है, जब किसी बेटी के साथ हुई घटना व्यवस्था की जवाबदेही पर सवाल खड़े करती है। उस समय सरकार का व्यवहार बताता है कि उसके नारे कितने सच्चे हैं और संवेदनशीलता कितनी वास्तविक। अंकिता के नाम पर राजनीति करने वालों से भी सवाल होना चाहिए। विपक्ष यदि परिवार के साथ खड़ा है तो उसे केवल बयान जारी करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे तथ्यों के आधार पर जांच और जवाबदेही की मांग करनी चाहिए। लेकिन सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी इससे कहीं बड़ी है, क्योंकि शासन और प्रशासन की जवाबदेही उसी पर है। वह विपक्ष पर राजनीति करने का आरोप लगाकर अपने दायित्व से मुक्त नहीं हो सकता। अंकिता का मामला किसी दल की चुनावी संपत्ति नहीं है। यह एक परिवार के न्याय, समाज के भरोसे और शासन की विश्वसनीयता का प्रश्न है। इसे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में उलझाकर मूल सवालों से बचने की कोशिश अंततः व्यवस्था को ही कमजोर करेगी। अंकिता के माता-पिता को आखिर दिल्ली के इंडिया गेट तक क्यों पहुंचना पड़ा? वह अपनी मांग लेकर अपने ही प्रदेश में संघर्ष करते रहे, अब देश की राजधानी में आवाज उठा रहे हैं। उनकी मांगों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई? कथित वीआइपी कोण की जांच की वास्तविक स्थिति क्या है? परिवार को किन सवालों के जवाब नहीं मिले हैं? यदि जांच पूरी हो चुकी है तो उसके निष्कर्ष क्या हैं? यदि कुछ बाकी है तो उसे पूरा करने की समयसीमा क्या है? सह पह सवाल हैं, जिनका जवाब किसी राजनीतिक नारे से नहीं दिया जा सकता। सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि परिवार की मांगों पर उसका रुख क्या है। पुलिस को हिरासत की कार्रवाई का आधार बताना चाहिए। संबंधित जांच एजेंसी को कानून के दायरे में जांच की स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। यही जवाबदेही है, यही पारदर्शिता है और यही जनता के विश्वास को बचाने का रास्ता है। सत्ता को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि पुलिस की कार्रवाई से असहमति समाप्त हो जाएगी। इतिहास गवाह है कि सवालों को दबाने की कोशिश अक्सर उन्हें और ताकतवर बना देती है। जिस मुद्दे पर स्पष्ट जवाब देकर स्थिति साफ की जा सकती है, उसे चुप्पी और सख्ती से उलझाना समझदारी नहीं है। अंकिता के माता-पिता सरकार से कोई राजनीतिक पुरस्कार नहीं मांग रहे। वह अपनी बेटी के मामले में उठ रहे सवालों का जवाब चाहते हैं। उनकी प्रत्येक मांग को बिना जांचे सही मान लेना जरूरी नहीं, लेकिन हर वैध मांग को सुनना और उसका तथ्यात्मक उत्तर देना सरकार का दायित्व है। यही कानून का राज है। यही लोकतांत्रिक मर्यादा है। सत्ता को समझना होगा कि न्याय की मांग करने वाले परिवार को हिरासत में लेकर वह अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। यदि कार्रवाई जरूरी थी तो उसका आधार सामने रखे। यदि जांच निष्पक्ष है तो उसके तथ्यों से भरोसा पैदा करे। और यदि परिवार की कोई मांग कानून के तहत पूरी नहीं की जा सकती तो उसका स्पष्ट कारण बताए। लोकतंत्र में जवाब की जगह आदेश और संवाद की जगह सख्ती लेने लगे तो नागरिक का भरोसा टूटता है। सबसे बड़ा सवाल यही है। अंकिता के माता-पिता की आवाज से सत्ता को डर किस बात का है? किसी आरोप से, किसी सवाल से या उस जवाबदेही से, जिससे बचने की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए? एक बेटी की हत्या के बाद उसके माता-पिता को न्याय के लिए दर-दर भटकना पड़े, राजधानी में धरना देना पड़े और फिर हिरासत का सामना करना पड़े, तो यह केवल एक परिवार की पीड़ा नहीं, पूरी व्यवस्था के लिए चेतावनी है। सरकार को तय करना है कि वह इस पीड़ा का जवाब संवेदनशीलता और पारदर्शिता से देगी या सख्ती और चुप्पी से। क्योंकि पुलिस की ताकत से धरना हटाया जा सकता है, लेकिन न्याय का सवाल नहीं। आवाज पर पहरा बैठाया जा सकता है, लेकिन सवालों को कैद नहीं किया जा सकता। अंकिता के माता-पिता को चुप कराने से बेहतर है कि उनके सवालों का जवाब दिया जाए। आखिर लोकतंत्र में सत्ता जनता से बड़ी नहीं होती और न्याय की मांग सत्ता की मेहरबानी नहीं, नागरिक का अधिकार है।

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