Home उत्तराखंड देहरादून बाजार की जंग में सत्ता पर सवाल

बाजार की जंग में सत्ता पर सवाल

0
56

दुनिया के सबसे चर्चित उद्योगपतियों में शामिल एलन मस्क ने भारत के दूरसंचार बाजार को लेकर एक ऐसा सवाल खड़ा किया है, जो किसी एक कंपनी या कारोबारी प्रतिद्वंद्विता तक सीमित नहीं है। स्पेसएक्स की उपग्रह आधारित इंटरनेट सेवा स्टारलिंक की भारत में शुरुआत को लेकर जारी खींचतान के बीच मस्क ने रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी को निशाने पर लेते हुए उन्हें व्यंग्यात्मक अंदाज में डियर प्राइम मिनिस्टर अंबानी और भारत का असली बास कह दिया। उनका आरोप है कि अंबानी भारतीय दूरसंचार बाजार में अपना एकाधिकार बनाए रखना चाहते हैं। यह आरोप मस्क ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लगाया है। इसे स्थापित तथ्य नहीं, बल्कि एक कारोबारी पक्ष का आरोप मानकर ही देखा जाना चाहिए। मस्क की इस टिप्पणी में व्यंग्य है, कारोबारी आक्रामकता है और भारतीय बाजार में प्रवेश को लेकर उनकी बेचौनी भी दिखाई देती है। लेकिन इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भारत जैसे विशाल बाजार में प्रतिस्पर्धा के नियम कौन तय करता है और उनका पालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी है? क्या किसी स्थापित कारोबारी समूह की बाजार में मजबूत स्थिति नए प्रतिस्पर्धियों के लिए बाधा बन रही है, या फिर नियामकीय मंजूरियों की प्रक्रिया को लेकर एक विदेशी कंपनी अधीर हो रही है? इन सवालों का जवाब सोशल मीडिया पर लगाए गए आरोपों से नहीं, बल्कि तथ्यों, नियमों और पारदर्शी निर्णय प्रक्रिया से मिलना चाहिए। भारत में इंटरनेट अब केवल सुविधा नहीं, बल्कि शिक्षा, रोजगार, व्यापार और सूचना तक पहुंच का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। देश के दूरदराज के पहाड़ी क्षेत्रों, सीमांत गांवों और उन इलाकों में जहां पारंपरिक दूरसंचार ढांचा पहुंचाना कठिन है, उपग्रह इंटरनेट नई संभावनाएं पैदा कर सकता है। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में इसकी उपयोगिता विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है। आपदा के समय जब सड़क संपर्क और सामान्य संचार व्यवस्था बाधित होती है, तब वैकल्पिक संचार तकनीक राहत एवं बचाव कार्यों में सहायक हो सकती है। हालांकि, इसकी वास्तविक उपयोगिता सेवा की उपलब्धता, लागत, तकनीकी क्षमता और स्थानीय जरूरतों पर निर्भर करेगी। मस्क इसी संभावना को अपने पक्ष में रखते हुए कहते हैं कि स्टारलिंक उन क्षेत्रों तक इंटरनेट पहुंचा सकती है, जहां आज भी कनेक्टिविटी की समस्या है। उनका तर्क है कि इससे बच्चों की शिक्षा और छोटे कारोबारों को वैश्विक बाजारों तक पहुंचने में मदद मिलेगी। यह तर्क महत्वहीन नहीं है। लेकिन किसी कंपनी का सामाजिक उपयोगिता का दावा अपने आप में उसके लिए नियामकीय नियमों से छूट का आधार भी नहीं बन सकता। असल सवाल प्रतिस्पर्धा का है। यदि स्टारलिंक भारत में सेवा देना चाहती है, तो उसे निर्धारित सुरक्षा शर्तों और नियामकीय आवश्यकताओं को पूरा करना होगा। दूसरी ओर, सरकार की जिम्मेदारी है कि इन नियमों को सभी पात्र कंपनियों पर समान रूप से लागू किया जाए। किसी कंपनी को केवल इसलिए विशेष सुविधा नहीं मिलनी चाहिए कि उसका प्रमुख दुनिया का प्रभावशाली उद्योगपति है। इसी तरह, किसी स्थापित भारतीय कारोबारी समूह को भी केवल अपनी बाजार स्थिति के कारण नए प्रतिस्पर्धियों के लिए अनुचित बाधा खड़ी करने का अवसर नहीं मिलना चाहिए। केंद्र सरकार ने मस्क के आरोपों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि भारत का उपग्रह संचार संबंधी नियामकीय ढांचा निष्पक्ष और भेदभावरहित है। केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी कहा कि भारत किसी क्षेत्र में एकाधिकार की अनुमति नहीं देता और सभी कंपनियों को निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन करना होगा। सरकार के मुताबिक, उपग्रह संचार सेवाओं से जुड़ी मंजूरी प्रक्रिया में सुरक्षा संबंधी शर्तें महत्वपूर्ण हैं। यही वह बिंदु है, जहां सरकार की परीक्षा शुरू होती है। यदि प्रक्रिया निष्पक्ष है, तो उसके निष्पक्ष होने के प्रमाण भी पारदर्शिता में दिखाई देने चाहिए। मंजूरियों में देरी क्यों हो रही है, किन शर्तों का अनुपालन बाकी है और संबंधित कंपनियों के आवेदन किस स्थिति में हैं कि इन सवालों पर स्पष्ट जानकारी अनावश्यक अटकलों को कम कर सकती है। कारोबारी विवादों में सरकार की विश्वसनीयता उसके बयानों से अधिक उसकी निष्पक्ष प्रक्रिया से बनती है। दूसरी ओर, मस्क को भी यह समझना होगा कि भारत का बाजार केवल संभावित ग्राहकों की बड़ी संख्या का नाम नहीं है। यह अपने कानूनों, सुरक्षा संबंधी चिंताओं और नियामकीय व्यवस्था वाला संप्रभु देश है। वैश्विक स्तर पर कारोबार करने वाली किसी कंपनी का आकार या प्रभाव उसे भारतीय नियमों से ऊपर नहीं रख सकता। यदि मस्क को किसी प्रक्रिया पर आपत्ति है, तो उसके समर्थन में प्रमाण और नियामकीय तथ्यों को सामने रखना अधिक उपयोगी होगा। किसी भारतीय उद्योगपति पर सार्वजनिक रूप से एकाधिकार का आरोप लगाना अपने आप में उस आरोप को प्रमाणित नहीं करता। मुकेश अंबानी और उनके कारोबारी समूह के संदर्भ में भी यही कसौटी लागू होनी चाहिए। किसी कंपनी की बड़ी बाजार हिस्सेदारी होना और प्रतिस्पर्धा को अनुचित ढंग से रोकना दो अलग बातें हैं। यदि बाजार में प्रतिस्पर्धा प्रभावित करने वाली किसी गतिविधि के प्रमाण हैं, तो उनकी जांच नियामकीय संस्थाओं को करनी चाहिए। केवल मस्क की टिप्पणी के आधार पर अंबानी पर लगाए गए आरोपों को सही मान लेना उतना ही अनुचित होगा, जितना बिना जांच किसी भी कारोबारी समूह को संदेह से परे मान लेना। इस विवाद का एक दूसरा पहलू भी है। भारत में उपग्रह इंटरनेट की प्रतिस्पर्धा केवल स्टारलिंक और रिलायंस जियो के बीच नहीं है। भारती समूह समर्थित यूटेलसैट वनवेब भी इस क्षेत्र का एक प्रमुख खिलाड़ी है। ऐसे में नीति का उद्देश्य किसी एक कंपनी को लाभ पहुंचाना नहीं, बल्कि ऐसा प्रतिस्पर्धी वातावरण बनाना होना चाहिएए जिसमें सभी पात्र कंपनियां समान नियमों के तहत सेवाएं दे सकें। अंततः उपभोक्ता के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि मस्क और अंबानी के बीच किसकी कारोबारी ताकत अधिक है। महत्वपूर्ण यह है कि क्या भारत में इंटरनेट सेवाओं की पहुंच बढ़ेगी, क्या उपभोक्ताओं को बेहतर विकल्प मिलेंगे और क्या प्रतिस्पर्धा के कारण सेवाओं की गुणवत्ता तथा कीमतों में सुधार होगा। दूरदराज के गांवों में रहने वाले लोगों के लिए तकनीक की सफलता का पैमाना उद्योगपतियों के बीच चलने वाली बयानबाजी नहीं, बल्कि उन्हें मिलने वाली वास्तविक सुविधा है। मस्क का प्राइम मिनिस्टर अंबानी वाला तंज सुर्खियां बटोर सकता है, लेकिन उससे भारतीय बाजार में एकाधिकार का आरोप सिद्ध नहीं होता। उसी तरह, सरकार का निष्पक्षता का दावा भी पारदर्शी प्रक्रिया की आवश्यकता को समाप्त नहीं करता। भारत को न तो किसी विदेशी उद्योगपति के दबाव में निर्णय करना चाहिए और न ही किसी घरेलू कारोबारी हित को सार्वजनिक हित से ऊपर रखना चाहिए। लोकतांत्रिक व्यवस्था में न उद्योगपति सरकार से ऊपर होता है, न कारोबारी प्रतिस्पर्धा के नियम किसी कंपनी की सुविधा के अनुसार तय होने चाहिए। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह कानून के अनुसार निर्णय करे, नियामकीय प्रक्रिया पारदर्शी रखे और उपभोक्ता के हित को केंद्र में रखे। यही कसौटी तय करेगी कि भारत का डिजिटल भविष्य कुछ कंपनियों के प्रभाव से संचालित होगा या निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और व्यापक जनहित से।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here