देश का भविष्य अगर युवाओं के कंधों पर टिका है, तो यह भी सच है कि आज वही युवा धीरे-धीरे नशे की गिरफ्त में फंसता जा रहा है। कभी शराब और तंबाकू तक सीमित रहने वाला नशा अब सिंथेटिक ड्रग्स, स्मैक, चरस, गांजा, एमडी और नशीली गोलियों के रूप में स्कूलों, कॉलेजों और छोटे कस्बों तक पहुंच चुका है। यह केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं रहा, बल्कि समाज, परिवार और सरकार तीनों की सामूहिक विफलता का आईना बन चुका है। उत्तराखंड जैसे शांत और सांस्कृतिक राज्य में भी नशे का फैलता जाल गंभीर चिंता का विषय है। देवभूमि की पहचान जहां आध्यात्मिकता, प्रकृति और संस्कारों से होती थी, वहीं अब कई जिलों में युवाओं के नशे की गिरफ्त में आने की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। सवाल यह है कि आखिर यह जहर युवाओं तक पहुंच कैसे रहा है? यदि पुलिस लगातार कार्रवाई कर रही है, तो तस्करी की यह श्रृंखला टूट क्यों नहीं रही? नशा बेचने वाले केवल अपराधी नहीं हैं, वे आने वाली पीढ़ी के भविष्य के हत्यारे हैं। लेकिन इससे भी बड़ा प्रश्न उन तंत्रों पर है जिनकी जिम्मेदारी इस कारोबार को रोकने की है। जब किसी क्षेत्र में बार-बार नशे की खेप पकड़ी जाती है, तो इसका अर्थ है कि कहीं न कहीं निगरानी और खुफिया तंत्र कमजोर है। छोटी-छोटी मछलियां पकड़ लेने से समस्या खत्म नहीं होगी। जरूरत उन बड़े नेटवर्क तक पहुंचने की है जो करोड़ों रुपये के इस अवैध कारोबार को संचालित कर रहे हैं। दूसरी ओर, केवल पुलिस कार्रवाई से भी समाधान नहीं निकलेगा। आज का युवा बेरोजगारी, प्रतिस्पर्धा, मानसिक तनाव, सोशल मीडिया की आभासी दुनिया और पारिवारिक संवाद की कमी से जूझ रहा है। जब जीवन में उद्देश्य धुंधला पड़ता है, तब नशा एक झूठा सहारा बन जाता है। इसलिए नशे के खिलाफ लड़ाई केवल थानों से नहीं, बल्कि घरों, स्कूलों और समाज से शुरू होगी। सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि कई माता-पिता अपने बच्चों की बदलती आदतों को समय रहते पहचान ही नहीं पाते। देर रात घर लौटना, पढ़ाई में रुचि कम होना, व्यवहार में चिड़चिड़ापन, अचानक पैसे की मांग बढ़नाकृये सभी संकेत हो सकते हैं। लेकिन अक्सर इन्हें उम्र का असर समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। यही लापरवाही कई परिवारों को जीवनभर का दर्द दे जाती है। सरकारें हर साल नशा मुक्ति अभियान चलाती हैं, रैलियां निकलती हैं, पोस्टर लगते हैं और भाषण दिए जाते हैं। लेकिन क्या कभी इन अभियानों के प्रभाव का आकलन किया गया? यदि जागरूकता अभियानों के बावजूद नशे का दायरा बढ़ रहा है, तो स्पष्ट है कि रणनीति बदलने की जरूरत है। स्कूलों और कालेजों में नियमित काउंसलिंग, खेल गतिविधियों का विस्तार, रोजगार के अवसर और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को प्राथमिकता देनी होगी। उत्तराखंड के संदर्भ में यह चुनौती और भी बड़ी है। सीमावर्ती क्षेत्र, पर्यटन, पलायन और बेरोजगारी जैसी परिस्थितियां नशा तस्करों के लिए अवसर बन रही हैं। यदि समय रहते कठोर और व्यापक कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या सामाजिक संकट का रूप ले सकती है। नशा केवल एक व्यक्ति को बर्बाद नहीं करता यह पूरे परिवार की खुशियां छीन लेता है। एक युवा जब नशे की गिरफ्त में आता है, तो उसके सपनों के साथ माता-पिता की उम्मीदें भी टूट जाती हैं। इसलिए यह लड़ाई किसी एक विभाग की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है। सरकार को चाहिए कि नशा तस्करी के खिलाफ जीरो टालरेंस की नीति अपनाए, बड़े गिरोहों पर आर्थिक प्रहार करे और दोषियों को शीघ्र कठोर सजा सुनिश्चित करे। वहीं समाज और परिवारों को भी अपने युवाओं के साथ संवाद बढ़ाना होगा। बच्चों को केवल करियर नहीं, जीवन जीने की दिशा भी देनी होगी। क्योंकि यदि आज हम युवाओं को नशे से नहीं बचा पाए, तो कल केवल आंकड़े बचेंगे युवा नहीं।




