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कोल पावर प्लांट पर घिरी धामी सरकार

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  • कांग्रेस ने निजी कंपनी को फायदा पहुंचाने और निविदा की शर्तों में हेरफेर का लगाया आरोप
  • सरकार का दावा-दीर्घकालिक बिजली संकट से निपटने के लिए पारदर्शी तरीके से लिया फैसला
  • विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही राज्य की राजनीति में चरम पर पहुंची बयानबाजी

    देहरादून। विधानसभा चुनाव की आहट के बीच उत्तराखंड की सियासत में बिजली का मुद्दा गरमाने लगा है। छत्तीसगढ़ स्थित प्रस्तावित कोयला आधारित ताप विद्युत परियोजना से 1320 मेगावाट बिजली खरीद के 25 वर्षीय करार को लेकर कांग्रेस ने धामी सरकार को सीधे निशाने पर लिया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि सार्वजनिक क्षेत्र की प्रस्तावित परियोजना को समाप्त कर निजी कंपनी से बिजली खरीद का रास्ता तैयार किया गया और निविदा की शर्तों में बड़े पैमाने पर बदलाव किए गए। दूसरी ओर सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए प्रक्रिया को नियमसम्मत, प्रतिस्पर्धी और राज्य की दीर्घकालिक बिजली जरूरतों को पूरा करने वाला बताया है।
    कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा ने दिल्ली में प्रेस वार्ता कर आरोप लगाया कि 1320 मेगावाट की बिजली खरीद के लिए जारी निविदा में कुल 86 में से 84 शर्तों में बदलाव किया गया। कांग्रेस का सवाल है कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में निविदा शर्तों में बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी और क्या इससे किसी विशेष कंपनी को लाभ पहुंचाने की स्थिति बनी। कांग्रेस के मुताबिक वर्ष 2024 में उत्तराखंड सरकार ने यूजेवीएनएल और टीएचडीसी के संयुक्त उपक्रम के माध्यम से 1320 मेगावाट का थर्मल पावर प्लांट लगाने का प्रस्ताव रखा था। पार्टी का दावा है कि केंद्र से सैद्धांतिक मंजूरी मिलने के बाद जनवरी 2025 में इस परियोजना को समाप्त कर दिया गया और फरवरी 2025 में बिजली खरीद के लिए नया टेंडर जारी किया गया।
    कांग्रेस का सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब राज्य की अपनी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां बिजली परियोजना विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रही थीं, तो उस प्रस्ताव को समाप्त करने के बाद बाहर से बिजली खरीदने का फैसला क्यों किया गया। पार्टी ने टेंडर में पावर प्लांट को उत्तराखंड के बजाय देश में कहीं भी स्थापित किए जाने की अनुमति, एक ही बोलीदाता से पूरी 1320 मेगावाट बिजली लेने तथा ट्रांसमिशन लागत से जुड़े प्रावधानों पर भी सवाल उठाए हैं। कांग्रेस का आरोप है कि इन बदलावों का सीधा संबंध छत्तीसगढ़ में प्रस्तावित परियोजना से है।
    उत्तराखंड कैबिनेट ने अगस्त 2026 में यूपीसीएल को अदाणी पावर से 25 साल तक 1320 मेगावाट बिजली खरीदने के लिए समझौता करने की अनुमति दी थी। प्रस्तावित दर 5.746 रुपये प्रति यूनिट बताई गई है। नियामक आयोग की स्वीकृति की प्रक्रिया भी इस करार का हिस्सा है। सरकार का तर्क है कि इससे राज्य की भविष्य की आधार-भार बिजली जरूरत सुरक्षित होगी और बिजली खरीद की लागत में अनिश्चितता कम होगी।यही दीर्घकालिक करार अब कांग्रेस के राजनीतिक हमले का केंद्र बन गया है। कांग्रेस ने 25 वर्षों में संभावित भुगतान को लेकर भी सवाल उठाए हैं और पूरी निविदा प्रक्रिया के दस्तावेज सार्वजनिक करने की मांग की है। पार्टी का कहना है कि वह सत्ता में आने पर इस करार की समीक्षा करेगी और यदि किसी स्तर पर अनियमितता मिलती है तो कार्रवाई की जाएगी।
    कांग्रेस के आरोपों के बीच सरकार ने अपना पक्ष भी सामने रखा है। प्रमुख सचिव ऊर्जा आर मीनाक्षी सुंदरम ने कहा है कि 1320 मेगावाट बिजली खरीद की प्रक्रिया नियमों, तकनीकी आवश्यकताओं और प्रतिस्पर्धी बोली व्यवस्था के तहत आगे बढ़ी है। उनके अनुसार आरएफक्यू चरण में पांच कंपनियां पात्र पाई गई थीं और अंतिम चयन प्रतिस्पर्धी बोली के आधार पर किया गया। प्रमुख सचिव ने यह भी स्पष्ट किया कि प्लांट के लिए उत्तराखंड के बाहर स्थान चुनने का विकल्प तकनीकी, पर्यावरणीय और कोयला परिवहन लागत को ध्यान में रखते हुए रखा गया। सरकार का कहना है कि निश्चित शुल्क की सीमा में बदलाव से उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा और अंतिम दरों का निर्धारण नियामकीय प्रक्रिया के तहत होगा।
    सियासी लड़ाई केवल कांग्रेस के आरोपों तक सीमित नहीं है। भाजपा ने पलटवार करते हुए कांग्रेस शासनकाल में काशीपुर के गैस आधारित बिजली संयंत्रों से जुड़े महंगे बिजली करार का मुद्दा उठाया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने मौजूदा करार की दर को कांग्रेस शासनकाल के कथित गैस पावर करार की तुलना में कम बताते हुए इसे राज्य की दीर्घकालिक बिजली जरूरत सुरक्षित करने वाला फैसला बताया है। इस तरह बिजली का मुद्दा अब महज ऊर्जा नीति का सवाल नहीं रह गया है। यह आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा और कांग्रेस के बीच आर्थिक फैसलों, सरकारी बनाम निजी क्षेत्र और जनता पर संभावित वित्तीय बोझ के सवालों को लेकर राजनीतिक टकराव का नया मैदान बनता जा रहा है।
    इस पूरे विवाद में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप अपनी जगह हैं, लेकिन जनता के सामने कुछ ठोस सवाल हैं कि निविदा की शर्तों में बड़े पैमाने पर बदलाव क्यों किए गए? सार्वजनिक क्षेत्र की प्रस्तावित परियोजना को समाप्त करने का तकनीकी आधार क्या था? छत्तीसगढ़ से बिजली खरीदना उत्तराखंड के लिए दीर्घकाल में कितना किफायती होगा? 25 साल के करार की कुल वित्तीय देनदारी क्या होगी? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या इस पूरी प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धा और पारदर्शिता के सभी मानकों का पालन हुआ? सरकार इन सवालों का तथ्यात्मक जवाब देकर विवाद को खत्म कर सकती है। वहीं कांग्रेस के लिए भी आरोपों से आगे बढ़कर दस्तावेजों और ठोस तथ्यों के साथ अपने सवालों को साबित करना चुनौती होगी। बिजली की जरूरत उत्तराखंड की है, भुगतान भी उत्तराखंड के उपभोक्ताओं को करना है। इसलिए चुनावी शोर से अलग इस करार की असली कसौटी यही होगी कि 25 साल की यह व्यवस्था राज्य को कितनी सुनिश्चित, किफायती और विश्वसनीय बिजली देती है।

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