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‘पहाड़’ के आशियानों से रूठी ‘घन्दूणी’

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  • पत्थर के घर उजड़े, तिबारियां टूटीं तो घन्दूणी ने भी छोड़ दिया आंगन
  • पहाड़ के गांवों से घन्दूणी के गायब होने के साथ मिट गई बचपन की यादें
  • देवभूमि के उजड़ते गांवों और रिश्तों की सबसे भावुक दास्तान है घन्दूणी
  • घन्दूणी का मौन दे रहा पलायन का दंश झेल रहे पहाड़ के गांवों की गवाही

देहरादून। पहाड़ के पारंपरिक पत्थरों वाले मकानों की खोली, लकड़ी की नक्काशीदार खिड़कियां और आंगन में सूखता मडुआ… इन सबके बीच जो एक आवाज पहाड़ के सुबह की पहचान हुआ करती थी, वह थीकृचीं-चीं, चूँ-चूँ। उत्तराखंड की लोकभाषा में जिसे बड़े लाड से घन्दूणी कहा जाता है, यानी हमारी अपनी गौरैया। पहाड़ के गांवों में कभी सुबह की शुरुआत घन्दूणी यानी गौरैया की चहचहाहट से होती थी। पत्थर की छतों और लकड़ी की तिबारियों वाले घरों में फुदकती यह छोटी चिड़िया गांव की रौनक मानी जाती थी। लेकिन अब बदलते पहाड़, तेजी से बढ़ते पलायन और आधुनिक निर्माण शैली के बीच घन्दूणी की आवाज भी धीरे-धीरे खामोश पड़ने लगी है।
पहाड़ के लोकगीतों में गौरैया यानी घन्दूणी को मैत की डाकिया कहा गया है। यह चिड़िया इस बात की गवाह है कि पहाड़ का सौंदर्य सिर्फ बर्फबारी और पहाड़ों की ऊंचाई में नहीं, बल्कि इन आंगनों की जीवंतता में है। आज उत्तराखंड के हजारों गांव आज पलायन की मार झेल रहे हैं। रोजगार, शिक्षा और बेहतर सुविधाओं की तलाश में लोग शहरों की ओर जा रहे हैं, जिन आंगनों में कभी बच्चों की किलकारियां और महिलाओं की आवाजें गूंजती थीं, वहां अब सन्नाटा पसरा है। इसी बदलते माहौल का असर घन्दूणी यानी गौरैया पर भी दिखाई दे रहा है।
मेरे ननिहाल दानकोट गांव के चेतराम बताते हैं कि पहले सुबह होते ही दर्जनों गौरैया आंगन में आती थीं। महिलाएं चावल और झंगोरे के दाने डालती थीं और बच्चे घंटों उन्हें देखते रहते थे। लेकिन अब गांवों में पुराने घर टूट रहे हैं और उनकी जगह सीमेंट के आधुनिक मकान ले रहे हैं। इन मकानों में ना तो लकड़ी के छज्जे बचे हैं और ना ही छोटी दरारें, जहां गौरैया अपने घोंसले बनाया करती थी।
बुडोली रूद्रप्रयाग के मोहन सिंह कहते हैं कि पहले घन्दूणी की आवाज से लगता था गांव जिंदा है। अब कई दिनों तक उसकी चहचहाहट सुनाई नहीं देती। उनके अनुसार गांवों से पहले लोग गए और अब धीरे-धीरे पक्षी भी गायब होने लगे हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि गौरैया मानव बस्तियों के साथ रहने वाली चिड़िया है। पुराने पहाड़ी घर, गौशालाएं, खुले आंगन और स्थानीय खेती उसके लिए अनुकूल वातावरण तैयार करते थे। लेकिन आधुनिकता की दौड़ में जैसे-जैसे गांवों की पारंपरिक संरचना खत्म हो रही है, वैसे-वैसे गौरैया का प्राकृतिक संसार भी सिमटता जा रहा है।
पर्यावरणविदों का कहना है कि गौरैया का कम होना केवल एक पक्षी का गायब होना नहीं, बल्कि पहाड़ की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना में आए बदलाव का संकेत है। पहाड़ के गांवों से जब इंसानों की रौनक खत्म हुई, तो घन्दूणी की चहचहाहट भी धीरे-धीरे यादों में बदलने लगी है। यदि गांवों में पारंपरिक आंगन, पेड़-पौधे और स्थानीय वातावरण को बचाने की दिशा में प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाले समय में गौरैया सिर्फ किताबों और यादों तक सीमित होकर रह जाएगी।
उत्तराखंड के कई गांवों में घर बंद पड़े हैं और आंगन सूने हो चुके हैं। ऐसे में घन्दूणी का गांवों से दूर होना लोगों को भावनात्मक रूप से भी प्रभावित कर रहा है। आज भी कई बुजुर्ग हर सुबह आंगन में कुछ दाने डाल देते हैं। शायद इस उम्मीद में कि कभी फिर घन्दूणी लौटेगी और उसके साथ लौट आएगा पहाड़ का पुराना जीवन, पुरानी गर्माहट और वह खोई हुई रौनक।


कंक्रीट के जंगल से उजड़ा आशियाना
उत्तराखंड के देहरादून, हल्द्वानी, हरिद्वार में तो कंक्रीट के मकानों और मोबाइल टावरों के रेडिएशन ने गौरैया को पहले ही गायब कर दिया था, लेकिन अब पहाड़ के ग्रामीण इलाकों में भी घन्दूणी का वजूद खतरे में है। कहते है कि जब किसी गांव से पलायन होता है और घरों पर ताले लटक जाते हैं, तो वहां खेती बंद हो जाती है। घन्दूणी को इंसानों के बीच रहने और उनके आंगनों से दाना चुगने की आदत होती है। इंसानों के जाते ही यह चिड़ियां भी भूखी मर जाती हैं या वहां से पलायन कर जाती हैं। पहाड़ के पुराने तिबारी वाले मकानों की छतों और कड़ियों के बीच गौरैया आसानी से घोंसला बना लेती थी। अब वहां भी सीमेंट के पक्के लेंटर वाले मकान बन रहे हैं, जिनमें इस नन्हीं चिड़िया के लिए कोई कोना नहीं बचा हुआ है।

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