केंद्र से लेकर यूपी और उत्तराखंड जैसे राज्यों की सत्ता से एक दशक से बाहर रहने वाली कांग्रेस जिसके बारे में यह कहा जाता था कि कांग्रेस को कोई नहीं हरा सकता है उसे कोई हरा सकता है तो वह सिर्फ कांग्रेस ही हरा सकती है। इस सत्य को हम बीते कुछ सालों में चरितार्थ होते देख रहे हैं। लगातार चुनावी असफलताओं ने उन खाटी कांग्रेसी नेताओं को भी आसहज कर दिया है जो पूरे जीवन सिर्फ कांग्रेस के लिए समर्पित रहे। उत्तराखंड में लगातार लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में पराजय का मुंह देखने वाली कांग्रेस 2027 में हर हाल में अपनी जीत का दावा करने वाली पार्टी के नेताओं के बीच अभी से जिस तरह से नाराजगी और वर्चस्व की जंग देखी जा रही है उसे लेकर अभी से सवाल उठने लगे हैं। जबकि चुनाव अभी बहुत दूर है। बीते दिनों दिल्ली में भाजपा के आधा दर्जन नेताओं द्वारा कांग्रेस की सदस्यता लेने पर समझा तो यह है जा रहा था कि कांग्रेस ने अभी से भाजपा पर बढ़त बनाना शुरू कर दिया है और इसमें कोई संदेह भी नहीं था कांग्रेस द्वारा ओवर की पहली ही बाल पर छक्का मारने जैसी इस घटना ने भाजपा को भी बहुत हद तक असहज कर दिया था लेकिन इसके साथ ही पूर्व सीएम हरीश रावत द्वारा 15 दिनों के अर्जित अवकाश पर जाने और पार्टी के राजनीतिक आयोजनों से विरत रहने की घोषणा ने सभी को चौंका दिया था। हरीश रावत के इस अवकाश की घोषणा का कारण सार्वजनिक हो चुका है। रामनगर के जाने—माने नेता संजय नेगी को कांग्रेस में शामिल न किया जाना हरीश रावत को इतना नागवार गुजरा कि अब इसे लेकर पार्टी के तमाम नेता आमने—सामने खुलकर आ चुके हैं। धारचूला विधायक हरीश धामी ने हरीश रावत की उपेक्षा पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए यहां तक कह दिया है कि उन्हें विधायकी छोड़ना पड़े तो वह इसके लिए भी तैयार है लेकिन हरीश रावत का साथ नहीं छोड़ सकते हैं। उन्होंने डा. हरक सिंह को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि जो लोग आज पार्टी को नसीहत कर रहे हैं कि किसी एक केे आने—जाने से क्या प्रभाव पड़ता है उन्हें 2016 का अपना इतिहास भी देखना चाहिए जब वह अपनी ही सरकार से बगावत कर भाजपा की गोद में जाकर बैठ गए थे। धामी ने उन सभी लोगों को आढे हाथ लेते हुए सांफ कहा है कि अगर वह हरीश रावत को दरकिनार करके 2027 में सत्ता हासिल कर लेंगे तो वह किसी मुगालते में न रहे। भले ही हरीश रावत के नेतृत्व में उन्हें नये क्षेत्रीय दल का गठन करना पड़े। उन्होंने कहा है कि हरीश रावत ने अपनी पूरी जिंदगी कांग्रेस को समर्पित कर रखी है उनकी पार्टी निष्ठा पर सवाल उठाने वाले अपने गिरेबान में झांक के देखें। चुनाव पूर्व पार्टी के अंदर उठने वाले इन बगावती सुरों से यह साफ हो गया है कि प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल भले ही कितने भी फूंक कर कदम रखकर और कांग्रेस नेताओं को एकजुट रखने का प्रयास कर ले लेकिन कांग्रेस के अंदर इस अंर्तकलह से निपटना सबसे कठिन चुनौती है। रंजीत रावत जिनकी हरीश रावत के साथ लंबे समय से अदावत चल रही है के दबाव में संजय नेगी को कांग्रेस में शामिल करने से रोके जाने का यह मुद्दा इतना तूल पकड़ चुका है कि इससे रामनगर की सीट ही नहीं बल्कि कई अन्य सीटों के नतीजे भी प्रभावित हो रहने की संभावनाएं हैं क्योंकि भाजपा संजय नेगी को अपने पाले में खींचने की जुगत में है।




