भले ही इजराइल और अमेरिका ने ईरान के खिलाफ शुरू किए गए युद्ध को चार—पांच दिन में समाप्त करने का मंसूबा पाला हुआ था लेकिन इजराइल और ईरान के बीच समझौता वार्ता के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति ने इस युद्ध की शुरुआत तो कर दी लेकिन सिर्फ पहले 5 दिन में ही अब ट्रंप और इजरायल के नेताओं को यह पता चल गया है कि ईरान को हराना उनके लिए कितना मुश्किल और ईरान की टॉप लीडर शिप का खात्मा करने की जो गलती उन्होंने की है वह अब उन पर कितनी भारी पड़ने वाली है। ईरान की रणनीतिक और युद्ध की तैयारियों ने उन्हें उनकी ताकत का एहसास बखूबी कर दिया है मिडिल ईस्ट के दर्जन भर जिन देशों को उनकी सुरक्षा की गारंटी के नाम पर अमेरिका द्वारा अपने एयरवेस बनाए गए थे उन्हें ईरानी मिसाइलों ने तहस—नहस कर दिया है। एक के बाद एक घटित होने वाली घटनाओं ने अमेरिका के पिट्ठू बने इन तमाम देशों का यह भ्रम तोड़ दिया है कि अमेरिका उनकी रक्षा नहीं कर सकता। 5 दिन में ही हालात ऐसे हो गए हैं कि वह अब मध्य पूर्व के 14 देशों में अपने नागरिकों से तुरंत देश छोड़ने को कहा जा रहा है इन दिनों में अमेरिका के दूतावासों पर ताले लटक चुके हैं तथा इन दिनों में फंसे अमेरिकी नागरिक कैसे वापस देश लौटे यह तक बताया नहीं जा रहा है। इस युद्ध पर होने वाले प्रतिदिन के भारी भरकम खर्च के बाद भी वह ईरानी मिसाइल के हमलो के आगे नहीं टिक पा रहा है। दूसरी ओर ईरान के समर्थन में खड़े होने वाले रूस और चीन जैसे बड़े देशों के साथ श्रीलंका जैसे छोटे देश भी आ गए हैं जो ट्रंप के टैरिफ वार से आहत और प्रभावित थे वह अब सब ईरान के पाले में आकर खड़े हो गए। बात अगर भारत की की जाए तो वह अभी तक इजरायल के पक्ष में ही झुका हुआ है जिसे तमाम विशेषज्ञ अनेक कारण बताकर इसे गलत ठहरा रहे हैं। कुल मिलाकर अब इस बात की आशंकाएं जताई जा रही है कि यह युद्ध बहुत जल्द समाप्त होने वाला नहीं है और यह भी आशंकाए जताई जा रही है कि इसकी विभिषिका उस परमाणु युद्ध तक भी जा सकती है जो कि दुनिया से परमाणु युद्ध के खतरे को कम करने के नाम पर डाला जा रहा है या शुरू किया गया है। भले ही यह युद्ध तृतीय विश्व युद्ध का रूप लेने तक पहुंचे न पहुंचे लेकिन जिस तरह पूरे विश्व की महाशक्तियां इस समय दो खेमों में बटं़ चुकी है उसके दूरगामी परिणाम होने तय है। इस समय चल रहे इस युद्ध की तात्कालिक और दीर्घकालिक परिस्थितियों पर अगर गौर किया जाए तो एशिया के तमाम देश जिसमें भारत भी शामिल है इस युद्ध के परिणाम के प्रभाव से नहीं बच सकता है। तमाम देशों में आने वाले बड़े संकट के रूप में तेल की कीमतों में होने वाली संभावित कमी को देखा जा रहा है। ईरान द्वारा जिस तरह से तेल की रिफाइनरियों और यातायात मार्ग को निशाने पर लिया जा रहा है उसे देखते हुए इस संभावना से इन्कार भी नहीं किया जा सकता है। ईरान द्वारा होर्मूज स्टेट को जिसे चल डमरू मध्य कहा जाता है की नाकेबंदी किए जाने पर तमाम देशों की तेल और गैस आपूर्ति प्रभावित होगी भारत को मिलने वाले तेल का 40 फीसदी इस मार्ग से आयात होता है अमेरिका के टैरिफ दबाव में भारत रूस से आयात होने वाले 20 लाख बैरल तेल की मात्रा पहले ही घटाकर 11 लाख बैरल कर चुका है। बात सिर्फ तेल संकट की तक नहीं है युद्ध के कारण विश्व भर के देश की और एवियेशन कंपनियों की कमाई पर भारी प्रभाव पड़ रहा है। वही टूरिज्म सेक्टर को भी भारी नुकसान हो रहा है। खाघ वस्तुओं तक की आपूर्ति पर इसका प्रभाव पड़ेगा अगर यह युद्ध लंबा ंिखचता है तो तमाम देशों को कई बड़े संकटों का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा।




